यह हैं लद्दाख की प्राचीन वैदिक आर्य जनजाति जिन्होंने हजारों सालों के उपरांत भी कायम रखी है अपनी पहचान !

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गार्खुन (लद्दाख) : हिमालय की कंदराओं में अनेकों मोती एवं रत्न बिखरे हुए हैं, जिनकी खोज के लिये हजारों सालों से श्रद्धालु जाते रहे हैं। यहां के वातावरण में एक चुंबकीय आकर्षण है जो स्मृति पटल पर हमेशा के लिये अंकित हो जाता है और बार-बार यहां आने के लिये प्रेरित करता है।

Garkhun (Ladakh): There are many pearls and gems scattered in the Kalias of the Himalayas, who have been visiting devotees for thousands of years for their discovery. Here is a magnetic attraction in the atmosphere which gets marked on the memory plate forever and inspires to come here again and again.

हिमालय की देवभूमि, तपोभूमि ऋषि एवं मुनियों के लिये साधना स्थल तो रहा ही हमारे देश के प्राचीनतम संस्कृति के चिह्न भी यहां देखे जा सकते है। हमारी संस्कृति एक जीवित संस्कृति है लेकिन यदाकदा बाहरी आक्रमणों से ये दूषित भी रही और इसके दुष्प्रभाव हमारी भाषा, हमारी संस्कृति और हमारे व्यवहार में भी देखने को मिलते हैं। एक समय था जब पूर भारतवर्ष में संस्कृत बोलचाल एवं व्यवहार की भाषा थी लेकिन अब ये कुछ विद्वानों तक ही सीमित रह गयी है लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि संस्कृत के शब्दों का प्रयोग एवं प्रभाव पूरे भारतवर्ष की भाषाओं में मिलता ही है और हिमालय की कंदराओं में अभी भी आर्य जनजातियां हैं जिन्होंने प्राचीन आर्यव्रत को अब भी अपने संस्कारों में संजोया हुआ है।

There is also a place of worship for the Goddess of the Himalayas, Tapo Bhumi Sage and Muni, and the signs of the ancient culture of our country can also be seen here. Our culture is a living culture, but it has also been contaminated by external attacks and its adverse effects are also seen in our language, our culture and our behavior. There was a time when the whole of India was the language of Sanskrit speaking and behavior in the whole of India but now it has remained confined to some scholars but you will be surprised that the words and usage of Sanskrit words are found in the languages ​​of entire India and in the Himalaya Kandraas There are still Arya tribes which ancient Aryavrata is still preserved in its sacraments.

लेह और कारगिल के बीच में सिंधु नदी के दोनों किनारों पर बुहत सारे गांव है जिनमें मुख्यतः दा, हनों, दरचिक और गार्खुन हैं जो आर्य गांव कहलाये जाते हैं और पूरे विश्व में आर्य प्रदेश के नाम से विख्यात हैं। यहां के लोगों को जिनमें पुरूष व महिलायें दोनों हैं जिनको फूलों से बहुत अधिक प्यार रहता है जो अपने शिश को फूलों से श्रृंगार करते हैं। इस आर्य घाटी में कुछ फूल ऐसे पाये हैं जो सालभर मुरझाते नहीं। यहां पर पाये जाने वाले केसरी रंग का फूल तोड़ने के बाद सालों साल ताजा रहता है। यहां के लोगों के अनुसार ये फूल दस-बारह साल तक तोड़ने के बाद भी तरो-ताजा रहता है। फूल सज्जा के साथ-साथ यहां के वासी रजत आभूषणों से सुशोभित रहते हैं। यहां के वासियों को दर्द जनजाति में शामिल किया गया है।

Between Leh and Kargil, on both sides of the river Indus, there are many villages, which are mainly Da, Han, Darchik and Garkhun, which are known as Arya villages and are known all over the world as the name of the Arya region. People here are both men and women who love a lot of flowers, who make their shirt beautiful with flowers. There are some flowers found in this Arya valley that do not fade over the years. The Kesari color found here is fresh year after year after breaking the flower. According to the people here, this flower remains fresh and fresh even after breaking for ten to twelve years. Along with flower decoration, the residents reside here with ornaments. The people here are included in the pain tribe.

दर्द जनजाति एलओसी के दोनों तरफ बसे हुए है। विभाजन के समय जो गांव एलओसी के दूसरी तरफ रह गये उन्होंने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है और इसके साथ ही उन्होंने प्राचीन धार्मिक मान्यताऐं खत्म कर दीं। जिन आर्य गांवों का उल्लेख हमने उपर किया है उनमें मुख्यतः दा, हनो, दरचिक और गारभंग, बेमा गांव हैं। ये हजारों वर्षों की प्राचीन मान्यताऐं अब भी संजोये हुए हैं जो इनके दिनचर्या, व्यवहार व इनके पर्वों में देखने को मिलती हैं। कारगिल के बटालिक क्षेत्र के गांव में भी दर्द जनजाति के लोग बसे हैं लेकिन उन्होंने पुरानी संस्कृति छोड़ दी है उसका मुख्य कारण मुस्लिम धर्म परिवर्तन है।

The tribal tribe has settled on both sides of the LoC. Those who remained on the other side of the LOC at the time of partition, have accepted the religion of Islam and at the same time they ended the ancient religious beliefs. The Arya villages which we have mentioned above are mainly Da, Hano, Darchik and Garbhanga, Bema village. These thousands of years of ancient beliefs are still conserved, which can be seen in their routine, behavior and their festivals. In the village of the Batalik region of Kargil, the people of the tribal settlement have settled but they have abandoned the old culture, the main reason behind this is Muslim conversion.

बटालिक के मुस्लिम गांव में नाच-गाना एवं संगीत नहीं होता है जबकि आर्य बौद्ध गांव में त्योहारों पर पारंपरिक नृत्य एवं संगीत एक नई शोभा एवं उमंग पैदा करता है। दर्द आर्य बौद्ध गांव की हम चर्चा करें तो ये 180-85 साल पहले बौद्ध धर्म का अनुकरण करने लगे लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने पारंपरिक वेश-भूषा पर्व त्योहार एवं मान्यताऐं भी रखीं जो अब भी सजीव हैं एवं आकर्षण का केंद्र हैं। इन गांवों के साथ लगे मुस्लिम दर्द गांव पुराने रीति रिवाज एव मान्यताओं से दूर चले गये हैं और इनके यहां कोई उत्सव देखने को नहीं मिलता। आर्य बौद्ध गांव में अभी भी प्राचीन पर्व सालभर मनायें जाते है जिनमें आस-पास के मुस्लिम गांव के लोग भी शामिल होते हैं। मुस्लिम गांव की भाषा में अब अरबी और फारसी शब्द बहुत तादाद में पाये जाने लगे हैं। उनकी भाषाओं का मूल स्वरूप बिगड़ने लगा है। इसका प्रमख कारण अपनी संस्कृति से कटना और कहीं न कहीं अपनी पहचान खो देना। आर्य दर्द गांवों का इतिहास अगर हम देखें तो ये इतिहास वैदिक काल काल से मिलता है। वैदिक समय जहां मुख्यतः संस्कृत भाषा का ही प्रचलन था और यहां की दर्द भाषा में भी पचास प्रतिशत से ज्यादा शब्द संस्कृत के अभी भी प्रचलन में हैं।

In the Muslim village of Batalik there is no dance and music, whereas in Arya Buddhist village, traditional dance and music on festivals produces a new beauty and embarrassment. When we discussed the Arya Buddhist village, they began to imitate Buddhism 180-85 years ago, but along with it, they also kept traditional Vesha-Bhausa festival and festivals which are still alive and are the center of attraction. The Muslim Pain Village, which has been engaged with these villages, has gone away from the old customs and beliefs, and they do not have any celebration here. Even in the Arya Buddhist village, ancient festivals are celebrated throughout the year, in which people from nearby Muslim villages are also involved. Arabic and Persian words are now being found in the language of Muslim villages. The basic form of their languages ​​has started to deteriorate. Its prime reason to cut off its culture and lose your identity somewhere. If we see history of Arya Pain villages, then this history meets the Vedic period. The Vedic period was mainly the practice of Sanskrit language and here in the pain language, more than fifty percent of the words are still in Sanskrit.

वैदिक देवताओं की बात करें तो देवता इंद्र जिनकों यहां के निवासी येनद्रन नाम से पूजते हैं। जो यहां के प्रमुख देवता हैं और जिनकी पूजा-अर्चना समय-समय पर खेती की खुशहाली के लिये की जाती है। इसके साथ-साथ नारायण भी सबसे बडा देवता है जो सबसे बड़ा पालनहार है। उसका आवाहन हर शुभ काम पर किया जाता है और उसके लिये यदाकदा अनुष्ठान भी किया जाता है। हर घर में अग्नि के देवता की पूजा भी होती है जिसका प्रमुख स्थान चूल्हे के पास रहता है और पहला भोग उसी को चढ़ाया जाता है। कुछ गांवों तक ही सीमित ये प्राचीन आर्य जनजाति जिन्होंने हजारों सालों के उपरांत भी अपनी पहचान कायम रखी है, लेकिन ये पहचान कब तक? जबकि आंतरिक एवं बाहरी प्रभाव से ये गांव भी अछूता नहीं है। जिनके शिश फूलों से संजाये रहते हैं ये कब तक हमें देखने को मिलेंगे ये कोई नहीं जानता।

Speaking of Vedic deities, Devta Indra, who reside here, is worshiped by Yindran. Which are the chief deities here and whose worship is from time to time for the betterment of farming. Along with this, Narayana is also the largest God who is the biggest worshiper. His appeal is done on every auspicious thing and for him it is also done rituals. Every home also has the worship of the God of fire, whose main place is near the stove and the first one is sacrificed to it. These ancient Aryan tribes, limited to some villages, have maintained their identity even after thousands of years, but how long will this identity be? However, this village is also not insulated with internal and external impact. No one knows how long they will get to see us.

बदलाव एक निरंतर क्रिया है, एक नदी के समान है जो निरंतर बहती रहती है। लेकिन एक संस्कृति नदी के तटों के समान है जो दृढ़ता से खड़ी रहती है। यहां के संस्कृति के उत्थान की बात करें तो राजकीय स्तर पर नहीं के बराबर कार्य हुआ है। यहां के क्षेत्र भी विकास से कोसों दूर है। यहां के गांव तक सड़क पहुंचाने का काम हाल में ही पूरा हुआ है और जितना भी कार्य हुआ है वो कार्य कारगिल युद्ध के बाद हुआ है। कारगिल युद्ध के बाद इस पूरे सीमावर्ती क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी। इस क्षेत्र में एक संग्रहालय खुलने से नई पहचान मिल गयी है। ये संग्रहालय गारखुन गांव में अक्टूबर में खुला जिसमें प्राचीन भवन के साथ-साथ पुरानी चीजें भी संजोकर रखी गयी हैं। हिमालयन म्यूजियम आॅफ लबदक कल्चर एंड ट्रेडिशन के नाम से इस संग्रहालय का उद्घाटन किया गया। जिसकी रूपरेखा विरेंद्र बांगरू जो इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सह प्राचार्य हैं ने तैयार की। इसके साथ-साथ लंदुप ताशी और यहां के गांववासियों ने बढ़ चढ़कर सहयोग दिया। इस संग्रहालय का उद्घाटना बोनाना उत्सव के दौरान किया गया। जो एक वार्षिक उत्सव है। इस उत्सव में देवताओं को पूजा जाता है एवं न्त्य एवं संगीत का आयोजन हर दिन होता है।

Change is a continuous action, similar to a river that keeps on flowing continuously. But a culture is like the banks of the river, which stands firmly. Talk about the upliftment of the culture here and there is no work at the state level. The areas here are also far from the development. The road to reach the village is completed in the recent past and the work that has taken place has happened after the Kargil war. This entire border area was given priority after the Kargil war. Opening a museum in this area has given new recognition. This museum is open in October at Garkhun village in which the old building along with the old things has been preserved. This museum was inaugurated by the name of the Himalayan Museum of Liberal Culture and Tradition. Whose framework is prepared by Virendra Bangru, who is the co-principal in the Indira Gandhi National Arts Center. Along with this, Lundup Tashi and the people of this village helped to increase their support. The museum was inaugurated during the Bonana festival. Which is an annual festival. In this festival, the deities are worshiped and dance and music are organized every day.

जिसमें पारंपरिक वेशभूषा में पुरूष एवं महिलाऐं नृत्य करती हैं। इस उत्सव के दौरान लोग पारंपरिक व्यंजन बनाते हैं और अतिथियों का सत्कार खूबानी और इसकी गिरी से किया जाता है। साथ में पारंपरिक छंग, स्थानीय मदिरा भी परोसी जाती है। यहां के आर्य गांव पर प्रकृति की एक अलग ही छटा देखने को मिलती है। स्वशीतल जल की छोटी-छोटी नदियां गाव में प्रवाहित होती हैं और खेतों में विभिन्न प्रकार के फूल जिनमें खुभानी, सेब, अंगूर इत्यादि हैं। ये पूरा क्षेत्र वनस्पति संपदा से समृद्ध है। और यहां की प्राचीन संस्कृति से इसमें और भी चार चांद लग जाते हैं। विरेंद्र बांगरू के अनुसार यहां की प्राचीन संस्कृति में वैदिक काल की झलक मिलती है। यहां के गीतों में पूरे वेद समाये हुए हैं। संग्रहालय बनने से यहां के लोगों में एक नया उत्साह जागा है और उनका अपनी संस्कृति के प्रति गौरव बढ़ा है। अपने ही चीजों को संग्रहालय में देखकर के यहां के लोगों को अपने संस्कृति के बारे में और सम्मान बढ़ा है। आने वाले दिनों में ये संग्रहालय एक सांस्कृतिक केंद्र बनकर पर्यटकों को भी आकर्षित करेगा।

In which the men and women dance in traditional costumes. During this festival people make traditional dishes and guests are hailed by apricot and its kernel. Along with traditional cloth, local wines are also served. Arya village has a different shade of nature. The small rivers of autonomous water flow in the village and there are various types of flowers in the fields, which include khobhani, apple, grapes etc. This entire area is rich in vegetable estates. And here’s the ancient culture, there are four more moons in it. According to Virendra Bangru, the ancient culture gets a glimpse of the Vedic period. The songs of the entire Vedas are contained here. The museum has created a new enthusiasm among the people here and has enhanced their pride towards their culture. Seeing their own things in the museum, people here have increased their respect for their culture. In the coming days, this museum will also attract tourists as a cultural center.

हिमालय के रत्नों की खोज में आर्य गांव का ये रत्न भारतवर्ष के मुकुट पर सुशोभित हैं। हम सबका ये दायित्व होना चाहिये कि हम हिमालय क्षेत्र के गांवों को सम्मानपूर्वक स्थान दें और यहां के विकास में भी यदाकदा सहयोग करें। एक पर्यटक के नाते भी हम इन क्षेत्रों में जाकर के विभिन्न सांस्कृतिक एवं विकास के कार्यों में सहयोग दे सकते हैं और यहां की संस्कृति का संदेश पूरे भारत में फैला सकते हैं।

In search of the gems of the Himalayas, these gems of Arya village are decorated on the crown of India. We should all have this obligation to give respect to the villages in the Himalayan region and to cooperate in this area. As a tourist we can also go to these areas to help in various cultural and developmental activities and spread the message of culture here in the whole of India.

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