इस बहादुर जवान ने 1800 चीनी फौजियों को उतर दिया था मौत के घाट, चीनी सेना की हो गई थी हवा खराब

जिस भूल को उस समय के राजनेताओं ने किया और जिस के चलते उन्होंने सेना को आगे कर के खुद पीछे हो गए थे उस भूल को सुधारते हुए सदा सदा के लिए अमरता पाने वाले मेजर शैतान सिंह जी का आज बलिदान दिवस है . अफ़सोस अपनी भूल की चर्चा न करने वाले उस समूह ने धीरे धीरे ऐसे अमर बलिदानियों को भी इसलिए भुला दिया क्योकि इनकी चर्चा होगी तो उन्हें अपनी बेहद शर्मनाक राष्ट्रनीति और विदेश नीति की भी चर्चा करनी होगी जिसके चलते एक छोटे देश जितना भूमि युद्धोन्मादी चीन हमसे ले कर चला गया . आईये याद करते हैं चीन युद्ध के उस अमर बलिदानी को जिसका नाम है मेजर शैतान सिंह |

Correcting that mistake, the mistake of the time that the politicians did, and due to which they had lagged behind the army, today is the sacrifice day of Major Shaitan Singh ji who has immortality for eternity. Sadly, the group who did not discuss their mistake gradually forgot such immortal sacrifices as they would be discussed, they would have to discuss their highly embarrassing nationalism and foreign policy, due to which the land warrior China took us from a small country. Did it Let us recall that the immortal sacrifice of the war of China, named Major Satan Singh.

जैसलमेर का प्राचीनतम इतिहास भाटी शूरवीरों की रण गाथाओं से भरा पड़ा है। जहाँ पर वीर अपने प्राणों की बाजी लगा कर भी रण क्षेत्र में जूझते हुए डटे रहते थे। मेजर शेतान सिंह की गौरव गाथा से भी उसी रणबंकुरी परम्परा की याद ताजा हो जाती है। जैसलमेर जिले के बंसार (बनासर) गांव के ले.कर्नल हेमसिंह भाटी के घर 1 दिसम्बर 1924 को जन्में इस रणबांकुरे ने मारवाड़ राज्य की प्रख्यात शिक्षण संस्था चैपासनी स्कुल से शिक्षा ग्रहण कर एक अगस्त 1949 को कुमाऊं रेजीमेंट में सैकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्ति प्राप्त कर भारत माता की सेवा में अपने आपको प्रस्तुत कर दिया था। मेजर शैतान सिंह के पिता कर्नल हेमसिंह भी अपनी रोबीली कमांडिंग आवाज, किसी भी तरह के घोड़े को काबू करने और सटीक निशानेबाजी के लिये प्रख्यात थे।

The oldest history of Jaisalmer is full of rhetoric of Bhati Knights. Wherever the heroes kept betting their lives, they kept fighting in the battlefield. Major Shaitan Singh’s Gaurav Gatha also reminisces the same Rambankuri tradition. Born on December 1, 1924, at the house of Late Colonel Hemsingh Bhati of Bansar (Banasar) village of Jaisalmer district, Ranbankur received an education from the Chapatiya School, a renowned educational institution of Marwar State, and was appointed as a Second Lieutenant in Kumaon Regiment on August 1, 1949. The tax was presented to him in the service of Mother India. Colonel Hemsingh, father of Major Shaitan Singh, was also famous for his robotic commanding voice, control of any kind of horse and precision shooting.

18 नवम्बर 1962 की सुबह अभी हुई ही नहीं थी, सर्द मौसम में सूर्यदेव अंगडाई लेकर सो रहे थे अभी बिस्तर से बाहर निकलने का उनका मन ही नहीं कर रहा था, रात से ही वहां बर्फ गिर रही थी। हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड के साथ ऐसी ठंडी बर्फीली हवा चल रही थी जो इंसान के शरीर से आर-पार हो जाये और इसी मौसम में जहाँ इंसान बिना छत और गर्म कपड़ों के एक पल भी नहीं ठहर सकता, उसी मौसम में समुद्र तल से 16404 फुट ऊँचे चुशूल क्षेत्र के रेजांगला दर्रे की ऊँची बर्फीली पहाड़ियों पर आसमान के नीचे, सिर पर बिना किसी छत और काम चलाऊ गर्म कपड़े और जूते पहने सर्द हवाओं व गिरती बर्फ के बीच हाथों में हथियार लिये ठिठुरते हुए भारतीय सेना की 13 वीं कुमाऊं रेजीमेंट की सी कम्पनी के 120 जवान अपने सेनानायक मेजर शैतान सिंह भाटी के नेतृत्व में बिना नींद की एक झपकी लिये भारत माता की रक्षार्थ तैनात थे।

It was not until morning on November 18, 1962 that Sundev was sleeping with an elephant in the cold weather, and he was not just trying to get out of bed, snow was falling from there at night. There was such cold ice-storm with winding humus, which crosses the human body, and in this season where people can not live without a roof and warm clothes, the same season, 16404 Under the skies above the sky on the high snowy mountains of the Rezangala Pass of the Foot High Catcher area, without any roof and work on the head, and the warm clothes worn by the shoes and the arms in the middle of the falling snow Titurte Indian Army’s 13th Kumaon Regiment of C Company of 120 personnel were deployed to escort their commandant Major Shaitan Singh Bharat Mata for a nap without sleep led Bhatti.

एक और खुली और ऊँची पहाड़ी पर चलने वाली तीक्ष्ण बर्फीली हवाएं जरुरत से कम कपड़ों को भेदते हुये जवानों के शरीर में घुस पुरा शरीर ठंडा करने की कोशिशों में जुटी थी वहीँ भारत माता को चीनी दुश्मन से बचाने की भावना उस कड़कड़ाती ठंड में उनके दिल में शोले भड़काकर उन्हें गर्म रखने में कामयाब हो रही थी। यह देशभक्ति की वह उच्च भावना ही थी जो इन कड़ाके की बर्फीली सर्दी में भी जवानों को सजग और सतर्क बनाये हुये थी।

The sharp snowy wind that runs on another open and high hill, was less inclined to wear the clothes of the soldiers in the jawans’ body and was trying to cool down the body. The feeling of saving Bharat Mata from the Chinese enemy was in the heart of that bitter cold. He was able to keep warm by shouting shola. It was a high sense of patriotism, which made the soldiers alert and alert even in the cold winter.

अभी दिन उगा भी नहीं था और रात के धुंधलके और गिरती बर्फ में जवानों ने देखा कि कई सारी रौशनीयां उनकी और बढ़ रही है चूँकि उस वक्त देश का दुश्मन चीन दोस्ती की आड़ में पीठ पर छुरा घोंप कर युद्ध की रणभेरी बजा चूका था, सो जवानों ने अपनी बंदूकों की नाल उनकी तरफ आती रोशनियों की और खोल दी। पर थोड़ी ही देर में मेजर शैतान सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उनके सैनिक जिन्हें दुश्मन समझ मार रहे है दरअसल वे चीनी सैनिक नहीं बल्कि गले में लालटेन लटकाये उनकी और बढ़ रहे याक है और उनके सैनिक चीनी सैनिकों के भरोसे उन्हें मारकर अपना गोला-बारूद फालतू ही खत्म कर रहे है।

The day was not too late, and in the twilight and falling snow in the night, the soldiers saw that many of the lights were growing up because at that time the country’s enemy China had stabbed on the back of the friendship of the enemy and had fought the battle of war. The soldiers opened the bridges of their guns and the illuminating lights on their side. But late in the short time, Major Shaitan Singh did not seem to understand that his soldiers, who are trying to understand the enemy, are not actually Chinese soldiers, but hanging lanterns in their throats and their growing yak and their soldiers, The ammunition is ending in a bad way.

दरअसल चीनी सेना के पास खुफिया जानकारी थी कि रेजांगला पर उपस्थित भारतीय सैनिक टुकड़ी में सिर्फ 120 जवान है और उनके पास 300-400 राउंड गोलियां और महज 1000 हथगोले है अतः अँधेरे और खराब मौसम का फायदा उठाते हुए चीनी सेना ने याक जानवरों के गले में लालटेन बांध उनकी और भेज दिया ताकि भारतीय सैनिकों का गोला-बारूद खत्म हो जाये। जब भारतीय जवानों ने याक पर फायरिंग बंद कर दी तब चीन ने अपने 2000 सैनिकों को रणनीति के तहत कई चरणों में हमले के लिए रणक्षेत्र में उतारा।

In fact, the Chinese army had intelligence that there were only 120 soldiers in the Indian troop at Rejangla and they had 300-400 round tablets and just 1000 grenades, taking advantage of the darkness and bad weather, the Chinese army threw the yak animals around The lantern dam was sent to them and the ammunition of Indian soldiers was over. When Indian soldiers stopped firing on Yak, then China launched its 2000 soldiers in the battlefield for the attack in several stages under the tactics.

मेजर शैतान सिंह Major Shaitan Singh ने वायरलेस पर स्थिति की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को देते हुये समय पर सहायता मांगी पर उच्चाधिकारियों से जबाब मिला कि वे सहायता पहुँचाने में असमर्थ है आपकी टुकड़ी के थोड़े से सैनिक चीनियों की बड़ी सेना को रोकने में असमर्थ रहेंगे अतः आप चैकी छोड़ पीछे हट जायें और अपने साथी सैनिकों के प्राण बचायें। उच्चाधिकारियों का आदेश सुनते ही मेजर शैतान सिंह के मस्तिष्क में कई विचार उमड़ने घुमड़ने लगे। वे सोचने कि उनके जिस वंश को उतर भड़ किंवाड़ की संज्ञा सिर्फ इसलिये दी गई कि भारत पर भूमार्ग से होने वाले हमलों का सबसे पहले मुकाबला जैसलमेर के भाटियों ने किया, आज फिर भारत पर हमला हो रहा है और उसका मुकाबला करने को उसी भाटी वंश के मेजर शैतान सिंह को मौका मिला है तो वह बिना मुकाबला किये पीछे हट अपने कुल की परम्परा को कैसे लजा सकता है?

Major Shaitan Singh, Major Shaitan Singh, gave information on the situation to his superior to his high officials and asked for help on time but the high commissioners received the help that they were unable to get help. Some of your troops will be unable to stop the large Chinese army, so you Leave the track behind and save the lives of your fellow soldiers. After listening to the order of the High Command, Major Shaitan Singh began to get entangled in many brainstorming ideas. They thought that the descendants of their descendants were given the name of the burden only because they were attacked by the Bhasis of Jaisalmer in the first place, that India is now attacking today and to fight it, the same Bhati dynasty Major Sainthan Singh has got an opportunity, how can he be restrained from his post-retreat without a fight?

और उतर भड़ किंवाड़ कहावत को चरितार्थ करने का निर्णय कर उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर पूरी स्थिति साफ साफ बताते हुये कहा कि – मुझे पता है हमने चीनियों का मुकाबला किया तो हमारे पास गोला बारूद कम पड़ जायेगा और पीछे से भी हमें कोई सहायता नहीं मिल सकती, ऐसे में हमें हर हाल में शहादत देनी पड़ेगी और हम में से कोई नहीं बचेगा। चूँकि उच्चाधिकारियों का पीछे हटने हेतु आदेश है अतः आप में से जिस किसी को भी अपने प्राण बचाने है वह पीछे हटने को स्वतंत्र है पर चूँकि मैंने कृष्ण के महान युदुवंश में जन्म लिया है और मेरे पुरखों ने सर्वदा ही भारत भूमि पर आक्रमण करने वालों से सबसे पहले लोहा लिया है, आज उसी परम्परा को निभाने का अवसर मुझे मिला है अतः मैं चीनी सेना का प्राण रहते दम तक मुकाबला करूँगा. यह मेरा दृढ निर्णय है।

They decided to call their soldiers and make the whole situation clear, saying that – I know if we fight against the Chinese, we will have less ammunition and we will not get any help from the back. In such a situation we will have to give martyrdom and none of us will survive. Since the high officials are ordered to retreat, therefore whoever you have saved your life is free to retreat but since I have been born in the great Yuduvans of Krishna and my forefathers always invaded the land of India. First of all, I have taken the iron, today I have had the opportunity to play the same tradition, so I will fight for the life of the Chinese army. This is my firm decision.

अपने सेनानायक के दृढ निर्णय के बारे में जानकार उस सैन्य टुकड़ी के हर सैनिक ने निश्चय कर लिया कि उनके शरीर में प्राण रहने तक वे मातृभूमि के लिये लड़ेंगे चाहे पीछे से उन्हें सहायता मिले या ना मिले. गोलियों की कमी पूरी करने के लिये निर्णय लिया गया कि एक भी गोली दुश्मन को मारे बिना खाली ना जाये और दुश्मन के मरने के बाद उसके हथियार छीन प्रयोग कर गोला-बारूद की कमी पूरी की जाय। और यही रणनीति अपना भारत माँ के गिनती के सपूत, २००० चीनी सैनिकों से भीड़ गये, चीनी सेना की तोपों व मोर्टारों के भयंकर आक्रमण के बावजूद हर सैनिक अपने प्राणों की आखिरी सांस तक एक एक सैनिक दस दस, बीस बीस दुश्मनों को मार कर शहीद होता रहा और आखिर में मेजर शैतान सिंह सहित कुछ व्यक्ति बुरी तरह घायलावस्था में जीवित बचे, बुरी तरह घायल हुए अपने मेजर को दो सैनिकों ने किसी तरह उठाकर एक बर्फीली चट्टान की आड़ में पहुँचाया और चिकित्सा के लिए नीचे चलने का आग्रह किया, ताकि अपने नायक को बचा सके किन्तु रणबांकुरे मेजर शैतान सिंह ने इनकार कर दिया।

Knowing about the strong determination of his commander, every soldier in that army decided that he would fight for the motherland till he died in his body, whether he could get help from him or not. It was decided to complete the reduction of bullets that one bullet should not be vacated without killing the enemy and after the enemy’s death, using the weapon of the enemy, the deficiency of ammunition should be met. And this strategy tactics of the counting of our mother mother, 2000 Chinese soldiers, despite the fierce invasion of Chinese army guns and mortars, every soldier killed one soldier ten ten, twenty two enemies, till the last breath of his life martyr And in the end some people, including Major Shaitan Singh, were living in a severely displaced situation, badly injured by the two soldiers, by taking some of the two soldiers in a hurry Of transported cover and urged walking down the medicine in order to save his hero but Rnbankure Major Shaitan Singh refused.

अपने दोनों सैनिकों को कहा कि उन्हें चट्टान के सहारे बिठाकर लाईट मशीनगन दुश्मन की और तैनात कर दे और गन के ट्रेगर को रस्सी के सहारे उनके एक पैर से बाँध दे ताकि वे एक पैर से गन को घुमाकर निशाना लगा सके और दुसरे घायल पैर से रस्सी के सहारे फायर कर सके क्योंकि मेजर के दोनों हाथ हमले में बुरी तरह से जख्मी हो गए थे उनके पेट में गोलियां लगने से खून बह रहा था जिस पर कपड़ा बाँध मेजर ने पोजीशन ली व उन दोनों जवानों को उनकी इच्छा के विपरीत पीछे जाकर उच्चाधिकारियों को सूचना देने को बाध्य कर भेज दिया।

Asked both of the soldiers to stand by the rock on them and light the machine gun and deploy the guns and tie the gun with one of their legs with the help of a rope so that they could be able to hit the gun with one leg and hit the other with a rope Could fire because with both hands of the Major had been badly injured in the attack, they were bleeding due to the bullets in their stomach, on which the garment dam Major took the position and Onon soldiers sent obliged to report back by officials against their will.

सैनिकों को भेज बुरी तरह से जख्मी मेजर चीनी सैनिकों से कब तक लड़ते रहे, कितनी देर लड़ते रहे और कब उनके प्राण शरीर छोड़ स्वर्ग को प्रस्थान कर गये किसी को नहीं पता. हाँ युद्ध के तीन महीनों बाद उनके परिजनों के आग्रह और बर्फ पिघलने के बाद सेना के जवान रेडक्रोस सोसायटी के साथ उनके शव की तलाश में जुटे और गडरियों की सुचना पर जब उस चट्टान के पास पहुंचे तब भी मेजर शैतान सिंह की लाश अपनी एल.एम.जी गन के साथ पोजीशन लिये वैसे ही मिली जैसे मरने के बाद भी वे दुश्मन के दांत खट्टे करने को तैनात है। मेजर के शव के साथ ही उनकी टुकड़ी के शहीद हुए 114 सैनिकों के शव भी अपने अपने हाथों में बंदूक व हथगोले लिये पड़े थे, लग रहा था जैसे अब भी वे उठकर दुश्मन से लोहा लेने को तैयार है।

When soldiers were sent to the badly wounded Major Chinese soldiers, how long did they fight and no one knows when their soul leaves the body and departed to heaven. Yes after the three months after the war, after the urging of his family and the melting of the snow, the army personnel gathered in search of his dead body along with the Red Cross Society, and when he reached the rock on the instructions of the guards, the corpse of Maj Shaitan Singh The position with the guns was found just like after death, they are deployed to sabotage the enemy’s teeth. Along with the body of Major, the bodies of 114 soldiers who had been martyred in their troop also laid guns and grenades in their own hands, and it seemed as if they got up and ready to take the iron with the enemy.

इस युद्ध में मेजर द्वारा भेजे गये दोनों संदेशवाहकों द्वारा बताई गई घटना पर सरकार ने तब भरोसा किया और शव खोजने को तैयार हुई जब चीनी सेना ने अपनी एक विज्ञप्ति में माना किया कि उसे सबसे ज्यादा जनहानि रेजांगला दर्रे पर हुई। मेजर शैतान सिंह की 120 सैनिकों वाली छोटी सी सैन्य टुकड़ी को मौत के घाट उतारने हेतु चीनी सेना को अपने 2000 सैनिकों में से 1800 सैनिकों की बलि देनी पड़ी। कहा जाता है कि मातृभूमि की रक्षा के लिए भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को देख चीनी सैनिकों ने जाते समय सम्मान के रूप में जमीन पर अपनी राइफलें उल्टी गाडने के बाद उन पर अपनी टोपियां रख दी थी। इस तरह भारतीय सैनिकों को शत्रु सैनिकों से सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ था। शवों की बरामदगी के बाद उनका यथास्थान पर सैन्य सम्मान के साथ दाहसंस्कार कर मेजर शैतान सिंह भाटी को अपने इस अदम्य साहस और अप्रत्याशित वीरता के लिये भारत सरकार ने सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

The government then relied on the incident as told by both the messengers sent by Major in this war and was ready to find the body when the Chinese army in one of its releases believed that it was the most massacre at the Rezangala Pass. The Chinese army had to sacrifice 1800 soldiers out of their 2000 soldiers to bring the small army of 120 soldiers, Major Sitan Singh to death. It is said that in view of the indomitable courage and sacrifice of Indian soldiers to protect the motherland, Chinese soldiers had kept their caps on them after vomiting their rifles on the ground in honor of their respect. In this way, Indian soldiers received the highest honor from enemy soldiers. After the recovery of dead bodies, Maj. Shaitan Singh Bhati, along with cremation with military honors at his place of honor, was honored with the Param Vir Chakra, the highest honor of the army, for his indomitable courage and unforeseen courage.

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