s400 anti guided misile sytem

प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट किया, ‘‘राष्ट्रपति पुतिन, भारत में आपका स्वागत है. बातचीत को लेकर उत्सुक हूं, इससे भारत-रूस संबंध और प्रगाढ़ होंगे.’’ उनका ट्वीट रूसी भाषा में भी पोस्ट किया गया. इसी त्वित के साथ चीन पाकिस्तान अमेरिका समेत पूरी दुनिया में खल बलि मच गयी हिया क्यूंकि शुक्रवार को भारत और रूस के बीच कई द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. इनमें भारत को एस-400 वायु रक्षा प्रणाली देने के लिए पांच अरब डॉलर का करार शामिल है.

हस्ताक्षर किए जाने वाले समझौतों से रक्षा, अंतरिक्ष, व्यापार, ऊर्जा और पर्यटन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन मुख्य ध्यान एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली सौदे पर होगा क्योंकि यदि इस पर हस्ताक्षर किए गए तो इससे रूस से हथियारों की खरीद पर अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन हो सकता है.

भारत ने संकेत दिए हैं कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद वह करार की दिशा में आगे बढ़ेगा. भारत अपने वायु रक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए लंबी दूरी की मिसाइल प्रणाली खरीदना चाहता है, खासतौर पर लगभग 4,000 किलोमीटर लंबी चीन-भारत सीमा के लिए. रूस भारत के प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ताओं में से एक रहा है.

भारत वर्तमान समय की सबसे आधुनिक वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली S-400 ‘ट्रायम्फ़ (Triumf) रूस से हासिल करने जा रहा है। एस-400 की पाँच यूनिटों की खरीद को लेकर भारत और रूस लगभग एक वर्ष से बातचीत कर रहे थे और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच इसी वर्ष अक्तूबर में होने वाली वार्षिक शिखर वार्ता के दौरान इस सौदे को अंतिम रूप दिये जाने की संभावना है।

क्या खास है S-400 वायु मिसाइल रक्षा प्रणाली में?

रूस की अल्माज़ केंद्रीय डिज़ाइन ब्यूरो द्वारा 1990 के दशक में विकसित यह वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली करीब 400 किलोमीटर के क्षेत्र में शत्रु के विमान, मिसाइल और यहाँ तक कि ड्रोन को नष्ट करने में सक्षम है।
एस-400 प्रणाली एस-300 का उन्नत संस्करण है।
यह मिसाइल प्रणाली रूस में 2007 से सेवा में है और दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
S-400 को सतह से हवा में मार करने वाला दुनिया का सबसे सक्षम मिसाइल सिस्टम माना जाता है।
सतह से हवा में प्रहार करने में सक्षम S-400 को रूस ने सीरिया में तैनात किया है।
S-400 मिसाइल प्रणाली S-300 का उन्नत संस्करण है, जो इसके 400 किमी. की रेंज में आने वाली मिसाइलों एवं पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को नष्ट कर सकता है। इसमें अमेरिका के सबसे उन्नत फाइटर जेट F-35 को भी गिराने की क्षमता है।
इस प्रणाली में एक साथ तीन मिसाइलें दागी जा सकती हैं और इसके प्रत्येक चरण में 72 मिसाइलें शामिल हैं, जो 36 लक्ष्यों पर सटीकता से मार करने में सक्षम हैं।
इस रक्षा प्रणाली से विमानों सहित क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों तथा ज़मीनी लक्ष्यों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

इससे पहले चीन ने 2014 में छह S-400 के लिये $3 बिलियन का रक्षा सौदा रूस के साथ किया था और चीन को अब इनकी आपूर्ति भी होने लगी है। दिसंबर 2017 में तुर्की ने ऐसी दो प्रणालियों के लिये एक समझौते पर हस्ताक्षर किये।

भारत के लिये महत्त्व

लंबी दूरी की रक्षा मिसाइल प्रणाली S-400 की खरीद को लेकर भारत और रूस के बीच हुआ यह समझौता सामरिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है।
भारत के लिये S-400 की तैनाती का मतलब है कि जब पाकिस्तानी विमान अपने हवाई क्षेत्र में उड़ रहे होंगे तब भी उन्हें ट्रैक किया जा सकेगा।
युद्ध की स्थिति में इसे केवल 5 मिनट में सक्रिय किया जा सकता है।
इसे भारतीय वायुसेना द्वारा संचालित किया जाएगा तथा इससे भारत के हवाई क्षेत्र में सुरक्षा को सुदृढ़ किया जा सकेगा।
नाटो में इस मिसाइल प्रणाली को SA-21 Growler नाम दिया गया है और वह अपने सदस्य देशों में इस प्रणाली को तैनात करने के खिलाफ है। इसके बावजूद तुर्की इसको अपने यहां तैनात करने जा रहा है।
एस-400 को अमेरिका की थाड एंटी मिसाइल सिस्टम की टक्कर का माना जाता है।

देश में इस प्रणाली के निर्माण की संभावनाएँ

भारत ने किसी भी बैलेस्टिक मिसाइल हमले को बीच में ही असफल करने में सक्षम इंटरसेप्टर मिसाइल के कई परीक्षण सफलतापूर्वक किये हैं।
मल्टी लेयर बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम विकसित करने के अपने प्रयासों के तहत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा निर्मित इस मिसाइल को एडवांस्ड एयर डिफेंस मिसाइल (एडीडी) के नाम से जाना जाता है।

फिलहाल यह मिसाइल 2000 किलोमीटर तक हवा में मार कर सकती है।
एकल चरण ठोस रॉकेट चालित 7.5 मीटर लंबी एडीडी इंटरसेप्टर मिसाइल में इनर्सियल नेविगेशन प्रणाली के अलावा एक हाईटेक कंप्यूटर, एक इलेक्ट्रो-मैकेनिकल एक्टीवेटर भी लगाया गया है।

इसका अपना अलग मोबाइल लॉन्चर, इंटरसेप्शन के लिये सिक्योर डेटा लिंक, स्वतंत्र ट्रैकिंग क्षमता और अत्याधुनिक रडार भी है।
स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इंटरसेप्टर मिसाइल द्वारा दुश्मन देश की मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता हासिल करने से देश के प्रतिरक्षा तंत्र को मज़बूती मिलने की आशा है।

विकास के चरण में है S-500

फिलहाल विकास के चरण में एस-500 पाँचवीं पीढ़ी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल रक्षा प्रणाली है।
इसे 55आर6एम ट्रायमफेटर-एम (55R6M Triumfator-M) नाम दिया गया है और इसके 2020 तक रूसी सेना में शामिल होने की संभावना है।
सतह से हवा में मार करने वाली इस रूसी एंटी बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली एस-500 का विकास भी अल्माज़ केंद्रीय डिज़ाइन ब्यूरो द्वारा किया जा रहा है।
एस-500 एयर डिफेंस सिस्टम एक ऐसी नई रेडियो संचार प्रणाली से लैस होगा, जिसे तीसरे पक्ष के द्वारा सुनना संभव नहीं होगा और यह लंबी दूरियों पर भी एकदम स्पष्ट संदेश पहुँचाएगा।
इस प्रणाली में लगे मिसाइल 7 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से उड़कर दुश्मन द्वारा छोड़े गए 10 सुपरसोनिक बैलिस्टिक रॉकेटों को एक साथ ढूँढ़कर उन्हें आकाश या अंतरिक्ष में ही नष्ट करने में सक्षम होंगे।
इसकी विशेषताएँ अमेरिका के थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसी होंगी और इसे अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के अलावा हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों और वायु रक्षा के लिये विमानों को अवरुद्ध तथा नष्ट करने के लिये डिज़ाइन किया गया है। माना जा रहा है कि यह रूसी मिसाइल रक्षा प्रणाली बेहद शक्तिशाली और मारक होगी तथा अमेरिका के अदृश्य लड़ाकू विमान F-22 और F-35 भी इसके सामने नाकाम सिद्ध होंगे।

इज़राइल का आयरन डोम

इज़राइल का यह एयर डिफेंस सिस्टम आयरन डोम फिलिस्तीनी गुट ‘हमास’ के हमलों को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
‘हमास’ की तरफ से दागे जाने वाले रॉकेटों को आयरन डोम हवा में ही ध्वस्त कर देता है।
यह एक ऐसी प्रणाली है जो रडार, इंटरसेप्टर और मिसाइल के बीच तालमेल से काम करती है।
जिस शहर को मिसाइल रोधी बनाना होता है, उसके आसपास पूरा मिसाइल रोधी सिस्टम लगाया जाता है, जिसमें कई रडार और इंटरसेप्टर होते हैं।
इंटरसेप्टर का लिंक उस लॉन्चिंग सेंटर से होता है जहाँ मिसाइलें तैनात रहती हैं और जैसे ही कोई मिसाइल रडार की सीमा में आती है आयरन डोम तुरंत सक्रिय हो जाता है।
इंटरसेप्टर मिसाइल की लोकेशन ट्रेस करके उसको ट्रैक करता है और तुरंत ही लॉन्चिंग सेंटर से मिसाइलें निकलकर उसी दिशा में बढ़ने लगती हैं, जिधर से आक्रामक मिसाइल आ रही होती है।
लॉन्चिंग सेंटर से निकली मिसाइल की प्रोग्रामिंग कंप्यूटर करता है, जिससे वह सीधे आक्रामक मिसाइल से जाकर टकरा जाती है और उसे हवा में ही नष्ट कर देती है।
इस सिस्टम में लगे लंबी दूरी के इज़राइली सोर्डफिश रडार 800 किलोमीटर दूर से आ रही मिसाइल को खोजने में सक्षम हैं।

अमेरिका का थाड (THAAD)

थाड का पूरा नाम है टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (Terminal High Altitude Area Defence) और यह विश्व की सर्वश्रेष्ठ मिसाइल वायु रक्षा प्रणालियों में मानी जाती है।
पिछले वर्ष जब उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच विवाद चरम पर था, तब अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की सुरक्षा के मद्देनज़र सियोंग्जू में इसकी तैनाती की थी।
1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान इराक की स्कड मिसाइल हमलों से हुए अनुभव के बाद थाड सिस्टम को विकसित किया गया था।
अमेरिका के लॉकहीड मार्टिन स्पेस सिस्टम्स द्वारा तैयार की जाने वाली यह प्रणाली मध्यम रेंज की बैलिस्टिक मिसाइलों को उड़ान के शुरुआती दौर में ही गिराने में सक्षम है।
इसकी टेक्नोलॉजी हिट टू किल है यानी सामने से आ रहे हथियार को रोकती नहीं बल्कि नष्ट कर देती है।
यह अपने आस-पास के 200 मीटर के दायरे में उड़ने वाली किसी भी मिसाइल को उड़ते ही नष्ट करने में सक्षम है।
यह 200 किलोमीटर दूर तक और 150 किलोमीटर की ऊँचाई तक मार करने में सक्षम है।
प्रत्येक थाड सिस्टम में पाँच महत्वपूर्ण घटक–इंटरसेप्टर, लॉन्चर, रडार, फायर कंट्रोल यूनिट व सपोर्ट इक्विपमेंट होते हैं।
इस तकनीक में लगा हुआ बेहद मज़बूत रडार सिस्टम आस-पास की मिसाइल को लॉन्च होते ही पकड़ लेता है और उसे शुरुआती चरण यानी उड़ान भरते ही नष्ट कर देता है।
थाड सिस्टम से एक बार में अलग-अलग आठ एंटी-मिसाइलें दागी जा सकती हैं।

रूस से सौदे पर अमेरिका को है आपत्ति
भारत ने अपनी सुरक्षा के लिये रूस से एस-400 मिसाइल प्रणाली की खरीद संबंधी बातचीत पूरी कर ली है। रूस पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते अमेरिका इस सौदे का विरोध कर रहा है, इसके अलावा उसका उद्देश्य अपनी थाड प्रणाली की खरीद के लिये दबाव बनाना भी है। लेकिन अमेरिका के विरोध के बावजूद 40 हज़ार करोड़ रुपए का यह सौदा भारत रूस के साथ करने जा रहा है। वैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत को चेतावनी दे चुके हैं कि यदि वह रूस के साथ यह सौदा करता है तो उसका परिणाम अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग में कमी के रूप में होगा।

लेकिन हालिया वर्षों में अमेरिका और भारत के सैन्य संबंधों में आए सुधार के मद्देनज़र अब दोनों देश अमेरिका के उस कानून के प्रावधानों से बचने के तरीके तलाश रहे हैं, जिसके तहत रूस के रक्षा अथवा खुफिया प्रतिष्ठानों से लेन-देन करने वाले देशों और कंपनियों को दंडित करने की बात कही गई है।

भारत का इस मामले में मत है कि चीन के साथ भी रूस रक्षा संबंधी सौदे करता है और यदि भारत ऐसे हथियार सौदे नहीं करेगा तो रूस इसे चीन के माध्यम से पाकिस्तान को भी बेच सकता है। भारत और अमेरिका अपनी-अपनी रक्षा संबंधित चिंताओं को साझा करते हुए द्विपक्षीय संबंधों को बाधित किये बिना इस समस्या को हल करने की राह तलाशने में लगे हैं।

मिसाइलों का वर्गीकरण
सामान्य तौर पर मिसाइलों को उनके प्रकार, लॉन्च मोड, रेंज, प्रोपल्शन, वारहेड और गाइडेंस सिस्टम के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

मुख्य रूप से मिसाइल दो प्रकार की होती हैं–1. क्रूज मिसाइल और 2. बैलिस्टिक मिसाइल।

1. क्रूज मिसाइल मानव-रहित, सेल्फ प्रोपेल्ड यानी स्वचालित गाइडेड मिसाइल है, जो एयरो-डायनेमिक लिफ्ट के माध्यम से हवा में उड़ान भरती है। इसका इस्तेमाल कोई आयुध या किसी खास पेलोड को लक्ष्य पर दागने के लिये किया जाता है। यह मिसाइल पृथ्वी के वायुमंडल के दायरे में उड़ान भरती है और इसमें जेट इंजन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है। सबसोनिक, सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक इसके विभिन्न प्रकार हैं।

2. बैलिस्टिक मिसाइल अपने प्रक्षेप पथ पर आगे बढ़ने वाली मिसाइल है, भले ही वह हथियार के तौर पर मारक क्षमता से युक्त हो या नहीं। इसे इसकी रेंज और धरती की सतह के जिस हिस्से से लॉन्च किया जाता है, वहां से उसके लक्ष्य तक की अधिकतम दूरी तक पेलोड को ले जाने के आधार पर कई श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

मारक क्षमता के आधार पर मिसाइलों का वर्गीकरण

कम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल
मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल
इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल
इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल
(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: चीन से लगती करीब 4000 किलोमीटर लंबी सीमा पर अपनी वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली को मजबूत करने के लिये भारत लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियाँ खरीदना चाहता है, और इसी कड़ी में शामिल होने जा रहा है रूस निर्मित दुनिया का बेहद उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम S-400 Triumf। दिलचस्प यह है कि चीन भी रूस से ऐसी ही मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीद रहा है और अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद चीन पहला देश था जिसने रूस से इस प्रणाली के लिये सौदा किया। रूस ने चीन को इसकी आपूर्ति शुरू भी कर दी है। वैसे तो भारत का मिसाइल कार्यक्रम इस दिशा में बढ़िया काम कर रहा है, लेकिन पड़ोसी देशों से लगातार बने रहने वाले सैन्य तनाव के मद्देनज़र अत्याधुनिक शस्त्र प्रणालियों को अपनी सुरक्षा के लिये तैनात करना भी ज़रूरी है।

हाल में रक्षा सहयोग के मामले में भारत अमेरिका के काफी निकट आया है और रक्षा संबंधों को मज़बूती देने के लिये दोनों देश प्रयत्नशील हैं। लेकिन इससे बड़ा सत्य यह है कि रूस भारत का विश्वसनीय सैन्य सहयोगी है और संकट के समय उसने इस विश्वास पर खरा उतर कर दिखाया भी है। बेशक अपना बाज़ार बनाए रखने के लिये अमेरिका और रूस भारत को हथियार उपलब्ध करा रहे हैं और आज विश्व में भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है। फिर भी भारत को सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी रक्षा स्वयं ही करनी होगी। कोई भी देश समग्र रूप से शक्तिशाली तब तक नहीं कहलाता, जब तक वह अपनी सुरक्षा का प्रबंधन स्वयं नहीं करता।

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