सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया भारतीय सेना के खिलाफ जबरदस्त फैसला, गुस्से में आये जवान,अर्बन नक्सलियों व् जिहादी तत्वों की साजिश हुई नाकाम

नई दिल्ली : देश के कुछ इलाके जो चरमपंथियों के विद्रोह को झेल रहे हैं, वहां केंद्र सरकार द्वारा लगाईं गयी आफ्स्पा के खिलाफ बड़ा षड्यंत्र चल रहा है. कुछ राष्ट्रविरोधी तत्व पिछले कई वर्षों से सरकार पर आफ्स्पा हटाने का दबाव बनाते आये हैं, मगर जब सरकार के सामने दाल नहीं गली तो अब सेना के जवानों को फंसाये जाने की साजिशें शुरू हो गयी हैं. देश की न्यायपालिका ने भी सेना के जवानों की बात सुनने से इंकार कर दिया है.

जवानों की याचिका खारिज“

अफस्पा मामले में अपने हितों को सुरक्षित करने की गुहार लेकर सेना के 356 जवानों और अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की थी, उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है. जवानों का कहना है कि आंतकवाद निरोधक अभियान के दौरान की गई कार्रवाई की भला कैसे सीबीआई या पुलिस जांच कर सकती है?

दरअसल सेना के जवान अपनी जान दांव पर लगा कर आतंकियों का खात्मा करते हैं, कई बार स्थानीय लोग इन आतंकियों का साथ भी देते हैं, ऐसे में उनके खिलाफ भी एक्शन लेना पड़ता है. मगर अब सेना के जवानों को सीबीआई व् पुलिस का डर दिखाया जा रहा है ताकि आतंकवाद विरोधी अभियान को कमजोर किया जा सके. ऐसा लगने लगा है कि सेना को आतंकियों के साथ-साथ सिस्टम व् न्यायपालिका में घुसे अर्बन नक्सलियों से भी लड़ना पडेगा!

`गुस्से में सेना के जवान!“

याचिका खारिज होने पर जवानों का कहना है कि इस बारे में कोर्ट का आदेश सेना का मनोबल तोड़ने वाला है. इससे आंतरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दिए फैसले में कहा था कि AFSPA (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) वाले इलाकों में हुई मुठभेड़ की भी पुलिस या CBI जांच हो सकती है.

सेना के लोगों पर भी सामान्य अदालत में मुकदमा चल सकता है. सुप्रीम कोर्ट इन दिनों मणिपुर में हुए सेना के ऑपरेशन्स की CBI जांच की निगरानी भी कर रहा है. दरअसल, सेना के 356 जवानों और अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि देश की सुरक्षा के लिए आर्म्‍ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (अफस्पा) के तहत कर्तव्य निर्वहन में किए कार्य के लिए उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई कर उनका उत्पीड़न न किया जाए.

ऐसे में उनके हित सुरक्षित रखने के लिए कोर्ट दिशा निर्देश जारी करे. याचिका में यह भी मांग है कि सरकार को आदेश दिया जाए कि वह सैनिकों के खिलाफ दुर्भावना से प्रेरित अभियोजनों और एफआईआर को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए.

अर्बन नक्सली व् जिहादी तत्व कर रहे हैं सेना के खिलाफ साजिश!“

याचिका में ये भी मांग उठाई गई थी कि केंद्र सरकार की पूर्व इजाजत के बगैर अफस्पा में प्राप्त शक्तियों के तहत की गई कार्रवाई के लिए कोई एफआईआर या अभियोजन न हो. उन लोगों और संस्थाओं के खिलाफ जांच हो जो कर्तव्य निर्वहन में लगे सैनिकों को दुर्भावनापूर्ण शिकायतें दाखिल कर निशाना बना रहें हैं. अनावश्यक एफआईआर दर्ज कर परेशान किए गए सैन्य अधिकारियों को उचित मुआवजा दिलाया जाए.

याचिका में कहा गया था कि अफस्पा के तहत सेना के जवान देश में उग्रवाद और छद्म युद्धों को रोकने के लिए लड़ाई लड़ते हैं. ऐसे में अफस्पा प्रोटेक्शन के अंतर्गत सशस्त्र बलों को मिले अधिकारों में कमी किया जाना देश की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है.

अफस्पा कानून में संशोधन के बिना सैन्य अधिकारियों के खिलाफ किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है. सैन्य अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार की इजाजत लेनी होगी.

आपको बता दें कि यह याचिका सीमा पर कठिन परिस्थितियों में देश की सुरक्षा करने वाले जवानों का आत्मविश्वास और मनोबल बनाए रखने के लिए भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों की ओर से सामूहिक तौर पर दाखिल की गई थी.

याचिका में यह भी कहा गया था कि जवान अपने कर्तव्य निर्वहन और देश की संप्रभुता व सुरक्षा कायम रखने के लिए विपरीत परिस्थितियों में काम करते हैं. वे इसके लिए अपना जीवन न्‍यौछावर करने में भी नहीं हिचकते, लेकिन उनके सहयोगियों के खिलाफ कर्तव्य निर्वाहन मे किये गये इन कार्यो के लिए आपराधिक मामला दर्ज कर कार्रवाई हो रही है. जिससे उन्हें याचिका दाखिल करने के लिए मजबूर होना पड़ा. संविधान में भी देश की संप्रभुता और सुरक्षा को सर्वोपरि माना गया है. ऐसे में अगर सेना को संरक्षण नहीं दिया गया तो देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा होगा.

मगर ऐसा लगने लगा है कि देश के बाहर के दुश्मनों से पहले भारत के सिस्टम में घुसे अर्बन नक्सलियों व् जिहादियों का सफाया ज्यादा आवश्यक हो गया है. कहा जा रहा है कि शिक्षा संस्थानों, मीडिया के अलावा देश की न्यायपालिका तक में अर्बन नक्सलियों की घसपैठ भीतर तक हो चुकी है, जो राष्ट्रद्रोहियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और सेना के मनोबल को तोड़ने वाले फैसले ले रहे हैं.

source dd bharti news

सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया सबसे बड़े केस में जबरदस्त फैसला,कांग्रेसी वामपंथी समेत दोगले पत्रकारों को लगा ज़ोरदार झटका

नई दिल्ली : आज देश में इतनी ज़्यादा विरोधियों ने असहिष्णुता फैला के रख दी है. जब 2g के आरोपी को यही कोर्ट बरी कर देते हैं तब ये कोर्ट कांग्रेस के लिए भगवान बन जाते हैं, सत्य की जीत बताई जाती है लेकिन जब कोर्ट कांग्रेस और वामपंथी के मनमुताबिक फैसला नहीं सुनाते है तब मिनटों में यही जज बदनाम कर दिए जाते हैं.

New Delhi: Today, more opposition in the country has kept the intolerance spread. When the court acquits the 2G accused, then these courts become God for the Congress, the truth is said to be victory, but when the court does not pronounce the verdict of the Congress and the Left, then the same judges are defamed in minutes. .

लेकिन हद तो तब हो रही है जब सुप्रीम कोर्ट के अभी अभी सबसे बड़े केस में फैसले सुनाये जाने से कांग्रेस से ज़्यादा कई दोगले पत्रकारों को तकलीफ हो रही वे जज की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं.

But the extent has come when the Supreme Court is hearing the judgment of the judge in relation to the judgment of the most senior case, due to which many journalists are suffering from the Congress.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर इस स्थिति को जारी रखा तो ये बहुत बड़ा खतरा होगा. जिस तरह से इस केस में याचिका डाली गई है ये सीधा न्यायपालिका पर हमला है. जो जज इस मामले की सुनवाई कर रहे थे, उनपर भी सीधा हमला किया गया था.

The Supreme Court said that if this situation continues, then it will be a very big danger. The way the petition has been filed in this case, this is an attack on the direct judiciary. The judges who were hearing this case were also directly attacked.

बता दें कि इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच कर रही थी. इस याचिका को कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला, पत्रकार बीएस लोने, बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन सहित कई अन्य पक्षकारों की ओर से दायर किया गया था.

Please tell that the hearing of this case was being done by a bench of Chief Justice Deepak Mishra, Justice M. Khanvilkar and Justice DV Chandrachud. This petition was filed on behalf of Congress leaders Tahsin Poonawala, journalist BS Lone, and many other parties including the Bombay Lawyer’s Association.

इसमें बड़ा हाथ वकील प्रशांत भूषण का भी है. वकील से सामाजिक कार्यकर्ता बने प्रशांत भूषण ने सोहराबुद्दीन शेख के एनकाउंटर को फर्जी बताया. साथ ही आधिकारिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी मानने से इंकार कर दिया.

There is also a big hand lawyer Prashant Bhushan. Prashant Bhushan, a social worker from the lawyer, said that the encounter of Sohrabuddin Sheikh is a fake. Also refused to accept the official post mortem report.

जस्टिस लोया की मौत को लेकर कांग्रेसी आस लगाए बैठे थे कि कोई साज़िश रच लेंगे मोदी सरकार के खिलाफ बड़ा षड़यंत्र रचा गया. जज लोया सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का केस देख रहे थे. उनकी साधारण दिल के दौरे से होने वाली मौत को कांग्रेस ने संदिग्ध और एक साजिश के तहत मौत बताया.

The Congressmen were sitting on the pretext that Justice Loya’s death was a big conspiracy against Modi Government. Judge Loya was watching the case of Sohrabuddin encounter. The Congress is suspected of death due to his simple heart attack and death under a conspiracy.

कांग्रेस ने अपनी पूरी ताक़त इस केस में झोंक दी थी जिसके बाद अब कोर्ट में शांतिपूर्ण बहस नहीं बल्कि चीख चीख कर जज पर दबाव और आरोप लगाए जाने लगे थे. इस फैसले को भी CJI दीपक मिश्रा देख रहे हैं, तभी कांग्रेस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग लाने जा रही थी.

The Congress had thrown its full force in this case, after which there was no peaceful debate in the court but screaming screaming and pressure was being made on the judge. This decision was also seen by CJI Deepak Mishra, when Congress was going to introduce impeachment against Deepak Mishra.

बता दें दिसंबर 2014 में जस्टिस लोया की नागपुर में मौत हो गई थी जिसे दिल का दौरा से मौत का कारण बताया गया था. जस्टिस लोया की मौत के बाद जिन जज ने इस मामले की सुनवाई की, उन्होंने अमित शाह को मामले में बरी कर दिया था. बस तब से कांग्रेस इस केस के पीछे हाथ धो के पड़ी थी.

In December 2014 Justice Loya was killed in Nagpur, who was told to have died due to heart attack. After the death of Justice Loya, the judge who had heard the case, had acquitted Amit Shah in the case. Since then the Congress had to wash hands behind this case.

यहाँ तक की जज लोया के परिवार को भी परेशान किया जा रहा था. जज लोया के बेटे अनुज लोया ने कुछ दिन पहले ही प्रेस कांफ्रेंस कर इस मुद्दे को बड़ा करने पर नाराजगी जताई थी. अनुज ने कहा था कि उनके पिता की मौत प्राकृतिक थी, कृपया उनकी मौत को राजनितिक मुद्दा न बनाएं.

Even the family of Judge Loya was being disturbed. Judge Loya’s son Anuj Loya had resented a few days ago by press conference and raised the issue. Anuj had said that his father’s death was natural, please do not make his death a political issue.

यह विडियो भी देखे

https://youtu.be/o9LQnPMci4I

https://youtu.be/WE3MmmBzG4k

SOURCE political report

दलित हिंसा से देश में आग लगने के बाद अब देश के टुकड़े करने जा रहे ये बड़े नेता गुस्से से भडक उठी जनता

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के SC/ST एक्ट को लेकर किये गए संशोधन के बाद भारत बंद दलित आंदोलन किया गया, जिसमे दंगाइयों और कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष ने आग में घी डालने का काम किया. एक तरफ कांग्रेस के नेता का वीडियो सामने आया जो सड़कों पर खुलेआम पुलिस पर गोली चला रहा था. दूसरी तरफ राहुल गाँधी अपने ट्वीट में सड़कों पर उतरे हज़ारों दलितों को शांत करने के बजाय उन्हें सलाम कर रहे थे.

New Delhi: After the revision of the SC / ST Act of the Supreme Court, the India Dalit movement was closed, in which the entire opposition, including the rioters and the Congress, was working to make ghee in the fire. On one hand a video of the leader of the Congress leader who was openly shooting the police on the streets. Rahul Gandhi, on the other hand, was greeted by thousands instead of quieting thousands of Dalit people on their streets in their tweets.

दलित नेता ने अब अलग राज्य की मांग उठायी

अभी हमने आपको बताया था कि राजस्थान के सैकड़ों दलित ने धमकी दी है कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गयी तो वे इस्लाम धर्म अपना लेंगे. तो वहीँ अभी मिल रही बड़ी खबर के मुताबिक दलित आंदोलन में हुई हिंसा की आग बुझने का नाम नहीं ले रही और दूसरी तरफ दलित नेता इसमें आग में घी डालते हुए अब देश तोड़ने का काम कर रहे हैं.

Dalit leader raised demand for separate state now

Right now, we told you that hundreds of Dalits from Rajasthan have threatened that they will adopt Islam if their demands are not accepted. According to the big news, he is not taking the name of the fire of the violence in the Dalit movement and on the other hand, the Dalit leaders are working to break the country after pouring ghee in the fire.

एक तरफ जहां दलित समुदाय के लोगों ने भारत बंद करके अपना विरोध जताया था, वहीं बिहार के एक नेता ने दलितों के लिए अलग देश की मांग कर दी है. बिहार के पूर्व मंत्री और jdu से निकाले गए दलित नेता रमई राम ने अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के लिए अलग राज्य ‘हरिजिस्तान’ की मांग की है.

On one hand, while the Dalit community had protested against the shutting down of India, a leader of Bihar has demanded a separate country for the dalits. Ramai Ram, a former Bihar minister and Dalit leader, who was expelled from the jdu, has demanded a separate state ‘Harjististan’ for scheduled caste and tribal communities.

हमें ‘हरिजिस्तान’ चाहिए

पूर्व मंत्री रमई राम ने यहां बुधवार को कहा, “देश में अनुसूचित जाति एवं जनजाति को मिले संवैधानिक अधिकारों को छीना जा रहा है. उनके मान-सम्मान को ठेस पहुंचाया जा रहा है, इसलिए हमें ‘हरिजिस्तान’ चाहिए.

We need ‘Harijastan’

Former minister Ramai Ram said on Wednesday, “Constitutional rights received for Scheduled Castes and Scheduled Tribes in the country are being snatched. Their honor is being hurled, therefore we need ‘Harisizastan’.

रमई राम ने पीएम मोदी पर हमला करते हुए कहा बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा आजादी के वक्त पाकिस्तान के बाद हरिजिस्तान की मांग उठाये जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि 70 सालों तक सरकार ने समाज में भाईचारा और प्रेम कायम रखा, लेकिन अब मौजूदा सरकार की नजर दलितों के विधि सम्मत अधिकारों पर है.

Ramai Ram attacked PM Modi, while referring to Baba Saheb Ambedkar’s demand for Harishabad demand after Pakistan at the time of independence, he said that for 70 years the government maintained brotherhood and love in the society but now the present government The eye is on the legal right of dalits.

इसके साथ साथ उन्होंने दो दिन पूर्व ‘भारत बंद’ के दौरान मारे गए लोगों को शहीद का दर्जा दिए जाने की भी मांग की है. राम जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता हैं, जो पूर्व अध्यक्ष शरद यादव के पार्टी से बाहर जाने के बाद उनके साथ चले गए. ‘हरिजिस्तान’ की मांग उठाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि देश की आजादी के वक्त बाबा साहेब आंबेडकर ने पाकिस्तान के बाद हरिजिस्तान की मांग की थी. उस समय हरिजिस्तान की मांग की जगह संविधान में विशेष सुविधा का प्रावधान किया गया था.

Along with this, he has also demanded martyr status for the people killed during ‘Bharat Bandh’ two days ago. Ram is a senior leader of the Janata Dal (United), who went with him after leaving the former president Sharad Yadav’s party. Claiming to lift the demand of ‘Hariszastan’, he said that Baba Saheb Ambedkar had demanded Harishabad after Pakistan during the country’s independence. At that time, there was a provision of special facility in the constitution rather than the demand of Haristan.

उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट की आड़ में एससी, एसटी को संविधान में मिली शक्तियों को छीनने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भारत बंद को ऐतिहासिक बताया.

He alleged that under the guise of the Supreme Court, the SC, ST is trying to snatch the powers conferred in the Constitution. He declared India’s closure as historic against the Supreme Court verdict.

जबकि ऐसे ही नेता लोगों को भड़कते हैं और भ्रम फैलाते हैं. इनकी वजह से ही सड़कों पर दंगे होते हैं. कोर्ट ने किसी एक्ट की कोई शक्ति नहीं छीनी है. बल्कि एक्ट में बहुत बड़ी खामी थी जिसका धड़ल्ले से दुरूपयोग हो रहा था और सरकार से जमकर लाखों मुआवज़ा लूटा जा रहा था.

Whereas such leaders flame people and spread illusions. Due to these, there are riots on roads. The court has not taken any power of any act. Rather, there was a huge defect in the act, which was being misused and millions of compensation was being looted to the government.

दरअसल SC / ST एक्ट मुताबिक किसी की भी गिरफ़्तारी मात्रा एक आरोप लगाने से हो जाती थी. जिसके बाद हज़ारों केस फर्जी पाय गए. और फर्जी मुकदद्मे में लाखों रूपए मुआवज़ा लूटा गया. इसलिए कोर्ट ने तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी बस. लेकिन अफवाह ये फैलाई गयी कि कोर्ट एक्ट ख़त्म कर रहा है.

In fact, according to the SC / ST Act, the arrest of anyone was due to an allegation. After which thousands of cases went bogus. And in the bribe case millions of rupees compensation was looted. That’s why the court immediately banned the arrest. But the rumor was spread that the court was finishing the act.

इन जैसे नेताओं की वजह से ही लोग दंगो में मरते हैं और अब ये उन मरने वालों के लिए शहीद का दर्जा मांग रहे हैं साथ ही चाहते हैं किसरकार मरने वालों के परिवार को मुआवज़ा दे और सम्मान दे.

Due to such leaders, people die in riots and now they are demanding martyr status for those who die, and also want that government compensate and give respect to the families of those who die.

यह भी देखे
https://youtu.be/Uzs16fYnw1k

https://youtu.be/VxtYK7YXsQ8

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ब्रेकिंग न्यूज़: सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद की सुनवाई आज, नीव रखने की तारीख हो सकती है ये…सुन विपक्षियों में मची खलबली..

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले पर सुनवाई होने वाली है। ऐसा माना जा रहा है कि कोर्ट में आज लगातार सुनवाई की तारीख तय हो सकती है। खबरों के मुताबिक इस केस के पक्षकारों का कहना है कि अब सुप्रीम कोर्ट से ही उम्मीद है, इस मामले को और नहीं टाला जाना चाहिए, जल्द से जल्द निर्णय सुनाने की जरूरत है।

new Delhi. The Supreme Court is scheduled to hear on Wednesday the Ayodhya Ram Janmabhoomi-Babri Masjid land dispute case. It is believed that the date of continuous hearing can be fixed in the court today. According to the news, the parties of this case say that now the Supreme Court is hopeful that this matter should not be avoided, the need to make the decision as soon as possible.

आपको बता दें की जो विपक्ष है वो बिलकुल भी नही चाहता है की राम मंदिर की नीव रखी जाए, कट्टरपंथी कांग्रेस कपिल सिब्बल जैसे लोग बिलकुल भी नही चाहते है की राम मंदिर बने वो चाहते है की बाबरी मस्जिद ही बने लेकिन ऐसा नही होगा क्योंकि देर हो सकती है पर अयोध्या राम जन्म भूमि पर राम मंदिर ही बनेगा..

Let us tell you that the Opposition does not want to keep the foundation of the Ram temple, people like the radical Congress Kapil Sibal do not want to be the Ram temple, they want the Babri Masjid to be made but it will not be because it is late May be but Ayodhya Ram will be the Ram temple on the birthplace.

पिछली बार 1 फरवरी को इस मामले की सुनवाई हुई थी, तब वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और गीता सहित 20 धार्मिक पुस्तकों से इस्तेमाल किए तथ्यों का अंग्रेजी में ट्रांसलेशन न होने की वजह से सुनवाई टालनी पड़ी थी। सुनवाई के दौरान पिटीशनर्स के वकील ने कहा था कि अयोध्या विवाद लोगों की भावनाओं से जुड़ा है। इस पर चीफ जस्टिस बोले- ऐसी दलीलें मुझे पसंद नहीं, यह सिर्फ भूमि विवाद है।

The last hearing was held on February 1, when the hearing of the facts used by 20 religious books including Valmiki Ramayana, Ramcharitmanas and Geeta had to be stopped due to lack of translation in English. During the hearing, the petitioner’s lawyer had said that the Ayodhya dispute is related to people’s feelings. Chief Justice said on this – I do not like such arguments, this is just a land dispute.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाइकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 13 याचिका दायर की गई थी। इस मामले से जुड़ी सभी अपील पर कोर्ट एक ही साथ सुनवाई करेगा, कोर्ट में पहले मुख्य पक्षकारो को जिरह का मौका मिलेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितम्बर 2010 को इस मामले में फ़ैसला सुनाते हुए विवादित स्थल को विवाद के तीनों पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और भगवान राम लला के बीच बांटने का आदेश दिया था।

Explain that 13 petitions were filed against the Allahabad High Court verdict in the Supreme Court. The court will hear the same on all appeals related to this case, in the court, the main parties will get a chance to cross-examine. The Allahabad High Court had ordered the division of the disputed site between the Sunni Waqf Board, Nirmohi Akhara and Lord Rama Lala to the disputed site on 30 September 2010.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को न्यायिक तरीके से सुलझाने के बजाय मसले का शांतिपूर्ण समाधान निकालने को कहा था लेकिन अब तक कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया है।

Earlier, the Supreme Court had asked the Ayodhya Ram Janmabhoomi-Babri Masjid to resolve the dispute rather than judicially, to solve a peaceful solution to the issue, but no positive result has been reached so far.

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PM मोदी ने संसद में किया ऐसा बड़ा खुलासा जिसे देख विपक्ष समेत मायावती मैं मची खलबली

20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (उत्‍पीड़न रोकथाम) एक्‍ट, 1989-एससी/एसटी एक्ट से सम्बंधित मामले पर फैसला लिया गया था. उच्च न्यायलय ने एक एक्ट के जरिये ईमानदार अधिकारियों को इस एक्ट में झूठा फंसाकर उन्हें अपना शिकार बनाया जा रहा था. जिसके चलते कोर्ट ने इस एक्ट के प्रावधानों को नरम कर दिया था. कोर्ट ने इसके पीछे दलील दी कि इस एक्ट के माध्यम से ईमानदार लोगों को ब्लैकमेल करके झूठे मामलों में फंसाया जा रहा था. जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल गिरफ़्तारी के प्रावधान को खत्म कर दिया था.

On March 20, the Supreme Court had taken a decision on the matter related to Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Harassment Prevention) Act, 1989-SC / ST Act. The High Court, through an act, was making a pretext to falsely implicate the honest officials in this act. Which led to the softening of the provisions of this Act. The court argued that this act was being framed by blackmailing honest people through false cases. To which the Supreme Court had ended the provision of immediate arrest.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दलित समुदाय के लोगों ने भारत बंद का ऐलान किया और सड़कों पर कोर्ट का विरोध करने उतर आये थे. दलित समुदाय के लोगों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में जमकर उत्पात मचाया और मासूम लोगों को अपना निशाना बनाया. बता दें इस दौरान उन्होंने जमकर तोड़-फोड़ और आगजनी की है. दलितों के इस आंदोलन ने एक बड़ी हिंसा का रूप ले लिया. जिसमें अब तक बताया जा रहा है कि 12 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. दलितों के इस विरोध प्रदर्शन के बीच अब मोदी सरकार का बड़ा बयान आया है जिसे जानने के बाद कईयों के होश उड़ जायेंगे. भारत बंद पर सरकार ने बड़ा खुलासा करते हुए देखिये क्या कहा है ?

After the Supreme Court’s decision, the people of the dalit community declared the bandh and went to protest against the court on the streets. The people of the dalit community fiercely attacked the different parts of the country and targeted their innocent people. Let them know that during this time they have made a lot of trash and arson. This movement of the Dalits took the form of a major violence. So far it is being told that more than 12 people have been killed. Among the protesters of Dalits, there has now been a big statement from the Modi Government that after knowing whom many senses will fly. Seeing the big disclosures made by the Government on the closure of India, what has been said?

बता दें केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भारत बंद के दौरान हुई हिंसा पर संसद में बयान दिया है. उन्होंने अपने बयान में कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा एसटी/एससी एक्ट में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है. उन्होंने आगे कहा है कि इस कानून को और भी मजबूत बनाया जायेगा. इसके आगे उन्होंने बताया है कि इस मामले में लोग सरकार को बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं और अफवाहें फैला रहे हैं, जबकि सरकार के द्वारा कानून में नए अपराधों को जोड़ा गया है. गौरतलब है कि उन्होंने इस बयान को देने के बाद सभी से शांति की अपील की है और कहा है कि राज्यों को हर प्रकार की मदद दी जाएगी. आरक्षण के मामले पर बोलते हुए उन्होंने कहा है कि जो बातें सुनने में आ रही हैं वह सिर्फ अफवाह हैं. उन्होंने बताया है कि केंद्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दो अप्रैल को रिव्यू पिटीशन याचिका दायर कर दी गयी है. जिसपर 3 अप्रैल को फैसला आना है.

Let the Union Home Minister Rajnath Singh make a statement in the Parliament on the violence that took place during the bandh. In his statement, he said that no change has been made by the Central Government in the ST / SC Act. He further said that this law will be further strengthened. He further said that in this case, people are plotting to defame the government and spreading rumors, while new laws have been added to the law by the government. Significantly, after giving this statement, he has appealed to all to peace and said that the states will be given all kinds of help. Speaking on the issue of reservation he said that the things that are being heard are just rumors. He has said that a review petition petition has been filed on behalf of the Central Government on April 2 in the Supreme Court. The decision on April 3 is to come.

केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ”केंद्र सरकार ने पूरी तत्परता दिखाते हुए दो अप्रैल 2018 के दिन पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी. मैं कहना चाहता हूं कि आरक्षण को लेकर जो अफवाहें फैलाई जा रही हैं, वह बेबुनियाद हैं. हमारी सरकार एसटी-एससी के हितों की रक्षा के प्रति पूरी तरह से संवेदनशील हैं. मैं सभी से शांति बनाए रखने की अपील करता हूं. हमने सभी राज्यों से शांति बनाए रखने के लिए एडवाइजरी भी जारी कर दी है. हमसे राज्यों द्वारा जो भी मदद मांगी गई हमने तत्परता के साथ उसे उपलब्ध कराया. राज्य सरकारों से हम लगातार संपर्क में हैं। मैं सभी राजनीतिक दलों से भी अपील करता हूं कि वे शांति और भाईचारा बनाए रखें.” उनके इस भाषण के दौरान भी विपक्ष में हंगामा कर रहा था.

Union minister Rajnath Singh has said that “The central government has filed a review petition on 2 April 2018, showing full readiness. I want to say that the rumors are being spread about the reservation is baseless. Our government is fully sensitive towards the protection of ST-SC interests. I appeal to all to keep peace. We have also issued advisories to keep peace from all the states. Whatever help we received from the states, we made it available with readiness. We are in constant contact with state governments. I also appeal to all political parties that they should maintain peace and brotherhood. “During his speech, he was making a ruckus in the opposition.

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सुप्रीम कोर्ट का मायावती वे मेवानी को जोरदार तमाचा दिखा दिये दिन में तारे

नई दिल्‍ली : सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम को कथित रूप से कमजोर करने वाले अपने हालिया फैसले पर मंगलवार को रेाक लगाने से इंकार कर दिया. अदालत ने इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से 3 दिन में राय मांगी है. इसके साथ ही मामले की अगली सुनवाई 10 द‍िन बाद तय की गई है. हालांकि अदालत ने इस केस में केंद्र की याचिका स्‍वीकार कर ली.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट मेें केंद्र सरकार द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका पर मंगलवार दोपहर सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल की दलीलों को सुनते सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी टिप्‍पणी करते हुए कहा कि ‘हम एससी/एसटी एक्‍ट के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन किसी बेकसूर को सजा नहीं मिलनी

इससे पहले सुबह सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते एससी/एसटी एक्‍ट पर शीर्ष अदालत के पूर्व के फैसले के चलते जैसे देश में इमरजेंसी जैसे हालात हैं. हजारों लोग सड़क पर हैं. लिहाजा, इस आदेश पर फिलहाल रोक लगाई जाए. अटॉर्नी जनरल की अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर दोपहर दो बजे खुली अदालत में सुनवाई को तैयार हो गया था.

सरकार ने समग्र पुनर्विचार याचिका भी दायर की
दरअसल, केंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से एससी/एसटी कानून पर दिए गए अपने हालिया फैसले की समीक्षा करने का आग्रह किया. सरकार का कहना है कि शीर्ष न्यायालय के फैसले से इस समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि केंद्र सरकार अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम पर उच्चतम न्यायालय के फैसले में कोई पक्षकार नहीं है और वह इस फैसले के पीछे दिए गए तर्क से ‘ससम्मान’ असहमत है. उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मामले पर एक समग्र पुनर्विचार याचिका भी दायर की है.

सरकार पूरी क्षमता के साथ न्यायालय में इस पर बहस करेगी- प्रसाद
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि सरकार पूरी क्षमता के साथ सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर बहस करेगी. उन्होंने इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने के लिए कांग्रेस पर हमला किया. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार हमेशा से उपेक्षित वर्ग के समर्थन में रही है और भाजपा ने ही देश को दलित राष्ट्रपति दिया है.

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ये वो बड़े कारण SC/ST एक्ट में हुए किन बदलावों पर मचा है पूरे देश भर में बवाल

एससी एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए बदलाव के खिलाफ देशभर में दलित संगठनों ने बंद का ऐलान किया है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को लेकर केंद्र सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगी. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को महाराष्ट्र के एक मामले को लेकर एससी एसटी एक्ट में नई गाइडलाइन जारी की थी. आइए जानते हैं क्या थी नई गाइडलाइन…

Against the changes made by the Supreme Court in the SC ST Act, the dalit organizations have announced a shutdown across the country. Meanwhile, the Central Government will file a reconsideration petition on the orders of the Supreme Court. Let us know that the Supreme Court had issued a new guideline in the SC ST Act on March 20 on a case related to Maharashtra. Let’s know what was the new guideline

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अधिनियम-1989 के दुरुपयोग पर बंदिश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के एतिहासिक फैसला सुनाया था. इसमें कहा गया था कि एससी एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी. इसके पहले आरोपों की डीएसपी स्तर का अधिकारी जांच करेगा. यदि आरोप सही पाए जाते हैं तभी आगे की कार्रवाई होगी.

Scheduled Caste Scheduled Tribes Act-1989 was passed by the Supreme Court’s historic decision to impose a ban on misuse. It was stated that after the FIR was registered under the SC ST Act, the immediate arrest of the accused would not be. Earlier, the DSP level official will investigate the allegations. If the allegations are found correct then only further action will be taken.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके गोयल और यूयू ललित की बेंच ने गाइडलाइन जारी करते हुए कहा था कि संसद ने यह कानून बनाते समय नहीं यह विचार नहीं आया होगा कि अधिनियम का दुरूपयोग भी हो सकता है. देशभर में ऐसे कई मामले सामने आई जिसमें इस अधिनियम के दुरूपयोग हुआ है.

The Supreme Court’s Justice AK Goyal and UU Lalit’s Bench issued the guidelines, saying that while making this legislation, Parliament should not have thought that misuse of the Act can also happen. There have been many such cases in the country which have been misused in this Act.

नई गाइडलाइन के तहत सरकारी कर्मचारियों को भी रखा गया है. यदि कोई सरकारी कर्मचारी अधिनियम का दुरूपयोग करता है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए विभागीय अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी. यदि कोई अधिकारी इस गाइडलाइन का उल्लंघन करता है तो उसे विभागीय कार्रवाई के साथ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई का भी सामना करना होगा.

Under the new guideline, government employees are also kept. If any government employee misuses the act, permission of the departmental officer will be necessary for his arrest. If an officer violates this guideline, he will also face the contempt proceedings of the court with departmental action.

वहीं, आम आदमियों के लिए गिरफ्तारी जिले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) की लिखित अनुमति के बाद ही होगी.इसके अलावा बेंच ने देश की सभी निचली अदालतों के मजिस्ट्रेट को भी गाइडलाइन अपनाने को कहा है.

At the same time, arrest for the common man will be done only after the written permission of the Senior Superintendent of Police (SSP) of the district. In addition, the Bench also asked the magistrate of all the lower courts to adopt the guidelines.

इसमें एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत पर मजिस्ट्रेट विचार करेंगे और अपने विवेक से जमानत मंजूर और नामंजूर करेंगे.

In this, the magistrate will consider the anticipatory bail on the accused under the SC / ST act and sanction and reject the bail from his discretion.

अब तक के एससी/एसटी एक्ट में यह होता था कि यदि कोई जातिसूचक शब्द कहकर गाली-गलौच करता है तो इसमें तुरंत मामला दर्ज कर गिरफ्तारी की जा सकती थी.

In the SC / ST Act so far, it was that if a caste terminology is said to be abusive then it could be arrested immediately by lodging a case.

बता दें कि ऐसे मामलों में कोर्ट अग्रिम जमानत नहीं देती थी. नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट के द्वारा ही दी जाती थी. लेकिन अब कोर्ट इसमें सुनवाई के बाद ही फैसला लेगा.

Explain that in such cases the court did not give anticipatory bail. Regular bail was granted only by the High Court. But now the court will take the decision only after hearing.

बता दें कि ऐसे मामलों में कोर्ट अग्रिम जमानत नहीं देती थी. नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट के द्वारा ही दी जाती थी. लेकिन अब कोर्ट इसमें सुनवाई के बाद ही फैसला लेगा.

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केरल लव जिहाद केस में बेहद चौकाने वाला खुलासा ,बिक गया इतने करोड़ में सुप्रीम कोर्ट न्याय

नई दिल्ली : क्या अदालतों में वाकई इन्साफ मिलता है? कई मौकों पर ऐसा देखने में आया है कि देश की न्याय व्यवस्था पैसेवालों की गुलाम बनी रहती है. धनबल का प्रयोग करके अपराधी अपने मन माफिक फैसला करवा लेते हैं और किसी के कानो पर जूं तक नहीं रेंगती. गरीबों को न्याय मिलने की कोई उम्मीद तक नहीं होती. अब केरल लव जिहाद मामले में भी एक नया एंगल सामने आया है, जिसने देश की न्याय व्यवस्था पर एक बार फिर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है.

New Delhi: Do the courts really get justice? On many occasions, it has been observed that the country’s judicial system continues to be a slave of the moneylenders. By using Dhanbal, the criminals make their mind-fix decisions and no one loses their ears on their ears. The poor do not have any hope of getting justice. Now a new angle has also emerged in Kerala Love Jihad case, which has once again questioned the country’s judicial system.

केरल लव जिहाद मामले में बिक गया न्याय?
केरल में हादिया ‘लव जिहाद’ मामले की जांच कर रही जांच एजेंसी एनआई कह-कह कर थक गयी कि उसे जांच के दौरान पुख्ता जानकारी मिली है कि पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) नाम की कट्टरपंथी संस्था लड़कियों को फंसाने के लिए ‘सम्मोहन’ का इस्तेमाल कर रही है. मगर सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की एक ना सुनी और हादिया के माता-पिता के खिलाफ फैसला सुना दिया.

Justice in Kerala Love Jihad case sold?
The investigating agency NI, who is investigating the Hadia ‘love jihad’ case in Kerala, was tired of saying, “During the investigation, it has been found that the fundamentalist organization, Popular Front of India (PFI), called for ‘hypnotism’ Is using. But the Supreme Court did not listen to one of the investigating agencies and heard the verdict against Hadiya’s parents.

हादिया के माता-पिता का भी कहना था कि पीएफआई द्वारा उनकी बेटी का ब्रेनवाश किया गया है, इसीलिए वो उनकी बोली बोल रही है, मगर सुप्रीम कोर्ट ने कट्टरपंथियों का साथ देते हुए हादिया के माता-पिता के खिलाफ फैसला सुनाया. मगर अब जो खुलासा हुआ है, उससे एक बार फिर ये साबित हो गया है कि इस देश में न्याय पैसेवालों की जेब में रहता है.

Hadia’s parents also had to say that their daughter has been brainwashed by PFI, that is why she is speaking her speech, but the Supreme Court has ruled against the parents of Hadia giving support to the fundamentalists. But now what has been revealed, once again it has been proved that justice in this country is in the pocket of the moneylenders.

1 करोड़ रुपये में पलटा फैसला
खुलासा हुआ है कि हादिया लव जिहाद केस में पीएफआई ने अपनी सारी ताकत और मोटा पैसा झोंका था, ताकि फैसला हादिया के माता-पिता के खिलाफ सुनाया जा सके. ये दावा किसी और ने नहीं बल्कि खुद पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने किया है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चले हदिया के मामले को लड़ने के लिए करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

1 crore rupee reversal decision
It is revealed that in the case of Hadia Love Jihad, the PFI had flown all its strength and fat money, so that the decision could be made against Hadiya’s parents. This claim has not been made by any other person but by the Popular Front of India (PFI), that he has spent around Rs 1 crore to fight the case of Hadia, who went to the Supreme Court.

पीएफआई की स्टेट कमेटी द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में यह जानकारी देते हुए पीएफआई के महासचिव मोहम्मद बशीर ने कहा कि विभिन्न अधिवक्ताओं को 93,85,000 रुपये का फीस के रूप में भुगतान किया गया है.
Giving this information in a press release issued by the State Committee of the PFI, PFI General Secretary Mohammad Bashir said that various advocates have been paid as fees of Rs 93,85,000.

वामपंथी और कोंग्रेसी वकीलों ने बनाया सच को झूठ
इस दौरान यात्रा एवं अन्य खर्च के लिए 5,17,324 खर्च किए गए जबकि कार्यालय में कागज के काम के लिए 50,000 रुपए का खर्च आया है. इस केस के लिए मोटी फीस लेने वाले वरिष्ठ वकीलों को नियुक्त किया गया. वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल इस केस में सात बार उपस्थित हुए जबकि इंदिरा जयसिंह चार बार, दुष्यंत दवे तीन बार और मार्सुके बफाकी एक बार आए.

Lieutenant and Congressian Lawyers Make The Truth To Lie
During this period, 5,17,324 were spent for travel and other expenses whereas for the work of paper, the expenditure of Rs. 50,000 has been spent. Senior lawyers who were taking high fees for this case were appointed. Senior advocate and Congress leader Kapil Sibal appeared in this case seven times while Indira Jaysingh four times, Dushyant Dave three times and Marsuke came to Buffie once.

देश में लव जिहाद इसी तरह से चलता रहे, इसके लिए बीरान, के.सी. नसीर और के.पी. मोहम्मद शरीफ ने निशुल्क सेवाएं दीं. वहीँ नूर मोहम्मद और पल्लवी प्रताप भी इस मामले में कई अवसरों पर उपस्थित थे.

Love jihad will continue in this way in the country, for this Biran, K.C. Naseer and K.P. Mohammed Sharif provided free services. Even Nur Mohammed and Pallavi Pratap were also present on this occasion in many cases.

देश तोड़ने में जुटे कट्टरपंथी संगठन
यहाँ सवाल ये उठता है कि यदि अखिला उर्फ़ हादिया की शादी का मामला लव जिहाद से जुड़ा नहीं है, तो आखिर कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पीएफआई ने इस केस में रूचि क्यों ली? क्या पीएफआई शादी के सभी मामलों में इसी तरह से रूचि लेती है?

Fundamentalist organizations engaged in breaking the country
Here the question arises that if the case of Akhila aka Hadiya’s marriage is not related to love jihad, then why did the fundamentalist Islamic organization PFI take interest in this case? Does PFI like this in all cases of marriage?

पीएफआई ने करोड़ों रुपये इस केस के लिए क्यों खर्च किये? क्या इससे जांच एजेंसी एनआईए की बात सच साबित नहीं होती कि हादिया लव जिहाद मामले में पीएफआई पूरी तरह से शामिल है. एनआईए की जांच के अनुसार पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया से जुड़ी संस्था सत्यसारिणी लव जिहाद के लिए बाकायदा साजिशों का जाल बुनती है.

Why did PFI spend crores of rupees for this case? Does not the fact that the investigating agency NIA does not prove that PFI is fully involved in the case of Hadiya Love Jihad. According to the NIA investigation, the organization associated with the Popular Front of India creates a network of conspiracies for the Satyajrani Love Jihad.

पूरी तरह से ब्रेन वाश की प्रक्रिया अपनायी जाती है, ठीक वैसे ही जैसे आम लोगों को ब्रेनवाश करके आत्मघाती हमलों के लिए तैयार किया जाता है. मगर फिर भी जांच एजेंसी की रिपोर्ट को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट ने हादिया के माता-पिता के खिलाफ ही फैसला सुना दिया.

The process of complete brain wash is adopted, just like ordinary people are brainwashed and prepared for suicide attacks. However, bypassing the investigating agency’s report, the Supreme Court heard the verdict against the parents of Hadiya.

पैसे की ताकत के सामने हार गए हादिया के माता-पिता
बता दें कि हाई कोर्ट ने इस मामले को लव जिहाद ही करार दिया था और हादिया के निकाह को खारिज कर दिया था. मगर फिर कट्टरपंथी संगठन पीएफआई ने पैसा झोंकना शुरू किया और सिब्बल जैसे बड़े-बड़े वकीलों को नियुक्त किया गया.

Hadia’s parents lost in power before money
Let the high court term this matter as love jihad and rejected Hadiya’s marriage. But then the fundamentalist organization PFI started spinning and big lawyers like Sibal were appointed.

झूठ को तोड़-मरोड़ कर सच का रूप देने में माहिर इन वकीलों की फ़ौज ने अपना कमाल दिखाया और देश की सर्वोच्च अदालत ने घुटने टेकते हुए हादिया की एक मुस्लिम युवक से शादी को खारिज करने के केरल हाई कोर्ट के आदेश को उलटते हुए दोनों को बतौर शौहर-बीवी साथ रहने की इजाजत दे दी.

The lawyers of these lawyers showed their amazingness by dividing the lie and the highest court of the country, kneeling on both sides, reversing the order of the Kerala High Court to dismiss the marriage of a Muslim youth of Hadia As allowed to live with Shaheraw-Biwi

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सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाते हुए उत्तराखंड मोदी सरकार ले आयी क्रन्तिकारी कानून, कांग्रेस के उड़े होश, जिहादियों की हुई दुकान बंद

नई दिल्ली : देशभर में लव जिहाद और जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर कई बार NIA एजेंसी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटा कर इन्साफ माँगा लेकिन हर बार मीलॉर्ड ने लवजिहाद को नकार दिया. लेकिन इसमें कोई शक नहीं की देश के कई राज्यों में चोरी छिपे लव जिहाद को बढ़ावा दिया जा रहा है.

ऐसे वक़्त पर मानवाधिकार आयोग भी लव जिहाद पर आखें मूंद कर बैठ जाता है. लेकिन जो काम देश के बड़े कोर्ट नहीं कर सके वो दिलेरी भरा काम उत्तराखंड में भाजपा सरकार ने कर दिखाया है.

सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा दिखाते हुए बीजेपी सरकार ने बनाया ऐतिहासिक कानून
अभी मिल रही खबर मुताबिक जिस काम को कांग्रेस सरकार ने इतने साल लटका के रखा और जिस मुद्दे पर तुष्टिकरण और वोटबैंक की राजनीति के चलते आखें बंद रखी उसी को लेकर अब उत्तराखंड में मोदी सरकार ने क्रन्तिकारी कानून बना दिया है. जी हाँ उत्तराखंड में अब धर्म परिवर्तन करने वालों की खैर नहीं.

उत्तराखंड सरकार ने विधानसभा सदन में धर्म स्वतंत्रता विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया है. इसमें गैर कानूनी ढंग से धर्म बदलने पर सख्त सजा का प्रावधान किया गया है. इस कानून के तहत अगर कोई बिना अनुमति के धर्मांतरण करता है या फिर ऐसी साजिश में शामिल पाया जाता है तो उसे अधिकतम पांच साल जेल की सजा काटनी होगी. वहीं अवयस्क महिला या फिर एससी-एसटी जाति के धर्म परिवर्तन गैर कानूनी ढंग से कराने पर सजा का प्रावधान सात वर्ष तक किया गया है. सरकार ने ऐसे धर्मांतरण को मान्यता ना देने प्रावधान कर दिया है.

लेनी होगी अनुमति
इस कानून में जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि यदि किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन करना है तो वह धर्म परिवर्तन की तारिख से एक महीने पहले संबंधित जिलाधिकारी के यहां आवेदन करना होगा. जिलाधिकारी की अनुमति के बाद ही संबंधित व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकेगा. अगर वो ऐसा नहीं करता है तो उसे ज़बरन धर्म परिवर्तन मानकर दंड किया जाएगा.

प्रलोभन देकर (नकद, रोजगार, निशुल्क शिक्षा, बेहतर जीवन, दैवीय कृपा), धमकाकर (कोई व्यक्ति किसी को डरा-धमका कर धर्मांतरण को विवश करता है) या षड्यंत्र रच कर (धर्मांतरण कराने के लिए किसी की सहायता करना, मनोवैज्ञानिक दबाव या फिर साजिश रचना. इसमें पारिवारिक सदस्य भी होंगे तो वे भी दायरे में आएंगे) धर्म परिवर्तन कराने की स्थिति में ये कानून लागू होगा.

बुधवार को विधानसभा के बजट सत्र में धर्म स्वतंत्रता अधिनियम-2018 अस्तित्व में लाया गया. इसके तहत राज्य में जबरन धर्म परिवर्तन गैर जमानती अपराध होगा. झूठ बोलकर धर्म परिवर्तन साबित होने पर विवाह को अमान्य घोषित किया जाएगा. इसका मुख्या लक्ष्य है लव जिहाद पर पूरी तरह ख़त्म करना है. इससे पहले हिमाचल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में भी ये कानून पास हो चुका है.

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आ गया सबसे बड़े चारा घोटाले पर सीबीआई कोर्ट का फैसला, लालू के बेटों का रो-रो के हुआ बुरा हाल

नई दिल्ली : जहाँ देशभर में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी घमासान मचा हुआ है वहीँ इस बीच सबसे बड़े चारा घोटाले में पहले से 5 साल की और साढ़े तीन साल की सजा काट रहे बलालू पर बहुत बड़ा फैसला आया है. जिसे सुन लालू यादव के पैरों तले जैसे ज़मीन ही फट पड़ी हो. चारा घोटाले के 6 में से 5वे मामले में अब लालू को कड़ी सजा का एलान सीबीआई कोर्ट ने किया है जिसे देख लालू परिवार बुरी तरह सदमे में आ गया है.लालू यादव को लेकर आ गया सबसे बड़ा फैसला, सदमे में गया परिवार

अभी मिल रही बहुत बड़ी खबर के मुताबिक चारा घोटाले के दुमका कोषागार से जुड़े चौथे मामले में रांची की एक विशेष सीबीआई अदालत ने शनिवार को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को अलग-अलग धाराओं के तहत 7-7 साल की दो सजा सुनाई. यानि उन्‍हें 14 साल की सजा सुनाई गई है. इसके साथ ही उन पर 60 लाख का जुर्माना लगाया गया है. जुर्माना नहीं भरने की सूरत में उनकी सजा की अवधि एक साल और बढ़ जाएगी.

सीबीआई के विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह ने दुमका कोषागार से गबन मामले में लालू प्रसाद को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत सात साल कैद की सजा और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत भी सात साल कैद की सजा सुनाई. सीबीआई के विशेष न्यायाधीश द्वारा सुनाई गई दोनों सजाएं एक के बाद एक चलेंगीं. इस तरह लालू प्रसाद को कुल 14 साल की सजा हुई. इसके अलावा उन पर साठ लाख रुपये का जुर्माना भी किया गया है.

लोगो ने कहा “अबकी बार लम्बे समय के लिए लालू का बेड़ा पार”

लालू यादव के खिलाफ IPC की धारा 120 बी, 467, 420, 409, 468, 471, 477ए और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट (PC Act) की धारा 13(2) रेड विथ 13(1)(सी)(डी) के तहत सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह की अदालत ने दोनो में 7-7 साल सजा और 30-30 लाख का जुर्माना लगाया है.

बता दें कि अगर सजा एक साथ चली तो लालू यादव को 7 साल ही जेल में रहना पड़ेगा. लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है तो उन्हें 14 साल की सजा काटनी पड़ेगी. तो वहीँ अभी भी एक मामला है जिस पर फैसला आना अभी बाकी है. जिसमे में भी लालू पर सजा का खतरा मंडरा रहा है क्यूंकि अभी तक चारा घोटाले के हर मामले में लालू को सजा मिलती आयी है.

लालू के वकील की उपस्थिति में सजा का ऐलान

लालू के रांची में अस्‍पताल में रिम्‍स में भर्ती होने के चलते वह सजा सुनाए जाने के दौरान अदालत के सम्‍मुख पेश नहीं हो सके, लिहाजा जज ने उनके वकील की उपस्थिति में ही सजा का ऐलान किया. अदालत के फैसले के बाद लालू के वकील ने बताया कि लालू को अलग-अलग धाराओं के तहत सुनाई गई 7-7 साल की सजाएं अलग- अलग चलेंगी. उन्‍होंने कहा कि हम इस फैसले के खिलाफ उच्‍च न्‍यायालय का रुख करेंगे. बता दें कि लालू यादव को चारा घोटाले के चौथे मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने सोमवार (19 मार्च) को लालू प्रसाद को दोषी करार दिया था.

इसी मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को बरी कर दिया गया था. जज शिवपाल सिंह ने दिसंबर 1995 से जनवरी 1996 तक दुमका कोषागार से फर्जी तरीके से 3.13 करोड़ रुपये निकालने के मामले में यह फैसला सुनाया. यह फैसला पहले 15 मार्च को सुनाया जाना था, जिसे चार बार पहले भी आगे बढ़ा दिया गया था. जज ने अपना फैसला वर्णानुक्रम के अनुसार सुनाया, लेकिन लालू यादव फैसला सुनाने के बाद अदालत पहुंचे. मिश्रा हालांकि सजा सुनाने के वक्त अदालत में मौजूद थे.

इससे पहले 24 जनवरी को चाईबासा कोषागार मामले में लालू को सजा सुनाई गयी. उससे पहले 6 जनवरी को देवघर कोषागार मामले में सुनाई गई सजा. बता दें 1996 में दर्ज हुआ था पहला मामला. उस समय मामले में 49 आरोपी थे.

मुकदमे के दौरान 14 की मौत हो गई. अदालत ने सोमवार को 31 आरोपियों में से 19 को दोषी करार दिया और 12 को बरी कर दिया. लालू प्रसाद को वर्ष 2013 में चारा घोटाले के पहले मामले में पांच वर्ष की सजा सुनाई गई थी. उन्हें 23 दिसंबर 2017 को इसके दूसरे मामले में दोषी ठहराया गया था और साढ़े तीन वर्ष की सजा सुनाई गई थी. वहीं चारा घोटाले के तीसरे मामले में उन्हें 24 जनवरी को पांच वर्ष की सजा सुनाई गई थी.

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