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इसरो के वैज्ञानिक नंबी नारायणन की कहानी देश के हर नागरिक को जाननी चाहिए ।

नंबी नारायणन को 1994 में केरल पुलिस ने जासूसी और भारत की रॉकेट टेक्नोलॉजी दुश्मन देश को बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया था।

तब ये मामला कई दिन अखबारों की सुर्खियों में रहा था, मीडिया ने बिना जांचे-परखे पुलिस की थ्योरी पर भरोसा करते हुए उन्हें गद्दार मान लिया था।

गिरफ्तारी के समय नंबी नारायणन रॉकेट में इस्तेमाल होने वाले स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने के बेहद करीब पहुंच चुके थे।
इस गिरफ्तारी ने देश के पूरे रॉकेट और क्रायोजेनिक प्रोग्राम को कई दशक पीछे धकेल दिया था।

उस घटना के करीब 24 साल बाद इस महान वैज्ञानिक को अब जाकर इंसाफ मिला है।

वैसे तो नंबी नारायणन 1996 में ही आरोपमुक्त हो गए थे, लेकिन उन्होंने अपने सम्मान की लड़ाई जारी रखी और अब 24 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ के सारे नेगेटिव रिकॉर्ड को हटाकर उनके सम्मान को दोबारा बहाल करने का आदेश दिया है
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने केरल सरकार को आदेश दिया है कि नारायणन को उनकी सारी बकाया रकम, मुआवजा और दूसरे लाभ दिए जाएं।
ये रकम केरल सरकार देगी और इसकी रिकवरी उन पुलिस अधिकारियों से की जाएगी जिन्होंने उन्हें जासूसी के झूठे मामले में फंसाया , साथ ही सभी सरकारी दस्तावेजों में नंबी नारायणन के खिलाफ दर्ज प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का आदेश दिया गया है।

कोर्ट ने कहा कि उन्हें हुए नुकसान की भरपाई पैसे से नहीं की जा सकती है, लेकिन नियमों के तहत उन्हें 75 लाख रुपये का भुगतान किया जाए। कोर्ट का आदेश सुनने के लिए 76 साल के नंबी नारायणन खुद कोर्ट में मौजूद थे।
नंबी नारायण के खिलाफ लगे आरोपों की जांच सीबीआई से करवाई गई थी और सीबीआई ने 1996 में उन्हें सारे आरोपों से मुक्त कर दिया था I
जांच में यह बात सामने आ गई कि भारत के स्पेस प्रोग्राम को डैमेज करने की नीयत से केरल की तत्कालीन वामपंथी सरकार ने नंबी नारायण को फंसाया था, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था।
सीबीआई की जांच में ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के इशारे पर केरल की कम्युनिस्ट सरकार ने नंबी को साजिश का शिकार बनाया
एक इतने सीनियर वैज्ञानिक को न सिर्फ गिरफ्तार करके लॉकअप में बंद किया गया, बल्कि उन्हें टॉर्चर किया गया कि वो बाकी वैज्ञानिकों के खिलाफ गवाही दे सकें।

ये सारी कवायद भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को ध्वस्त करने की नीयत से हो रही थी, ये वो दौर था जब भारत जैसे देश अमेरिका से स्पेस टेक्नोलॉजी करोड़ों रुपये किराये पर लिया करते थे।
भारत के आत्मनिर्भर होने से अमेरिका को अपना कारोबारी नुकसान होने का डर था। जिसके लिए सीआईए ने वामपंथी पार्टियों को अपना हथियार बनाया।
एसआईटी के जिस अधिकारी सीबी मैथ्यूज़ ने नंबी के खिलाफ जांच की थी, उसे कम्युनिस्ट सरकार ने बाद में राज्य का डीजीपी बना दिया , सीबी मैथ्यूज के अलावा तब के एसपी केके जोशुआ और एस विजयन के भी इस साजिश में शामिल होने की बात सामने आ चुकी है।

1994 की केरल सरकार के अलावा तब केंद्र की सरकार की भूमिका भी संदिग्ध है, जिसने इतने बड़े वैज्ञानिक के खिलाफ साजिश पर अांखें बंद कर ली थीं।
अगर नंबी नारायण के खिलाफ साजिश नहीं हुई होती तो भारत को अपना पहला क्रायोजेनिक इंजन 15 साल पहले मिल गया होता और इसरो आज पूरी दुनिया से पंद्रह वर्ष आगे होता।
उस दौर में भारत क्रायोजेनिक इंजन को किसी भी हाल में पाना चाहता था। अमेरिका ने इसे देने से साफ इनकार कर दिया। जिसके बाद रूस से समझौता करने की कोशिश हुई, रूस से बातचीत अंतिम चरण में थी, तभी अमेरिका के दबाव में रूस मुकर गया।
इसके बाद नंबी नारायणन ने सरकार को भरोसा दिलाया कि वो और उनकी टीम देसी क्रायोजेनिक इंजन बनाकर दिखाएंगे ।
उनका ये मिशन सही रास्ते पर चल रहा था कि तब तक वो साजिश के शिकार हो गए नंबी नारायण ने अपने साथ हुई साजिश पर ‘रेडी टु फायर’ नाम से एक किताब भी लिखी।

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नई दिल्ली : इसरो की जासूसी के आरोपों से इसरो के पूर्व वैज्ञानिक नंबी नारायण को सुप्रीम कोर्ट से दोषमुक्त करार दिए दिया है. वहीं सुप्रीम कोर्ट ने वैज्ञानिक को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश दिए जाने का आदेश दिया है. न्यायालय के इस आदेश के बाद इसी मामले में 1994 में गिरफ्तार की गई मालदीव की नागरिक मरियम रशीदा ने अंग्रेसी के अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को फोन कर के कहा कि वो भी जल्द ही इस मामले में उन्हें गिरफ्तार करने वाले पुलिस वालों के खिलाफ मुकदमा करेंगी और मुआवजे की मांग करेंगी. हालांकि वह इस समय कहां रह रही हैं और क्या कर रही हैं इस बारे में उन्होंने कोई जानकारी नहीं दी.

कस्टडी में ले कर काफी टॉर्चर किया गया
उन्होंने फोन पर बताया कि नंबी नारायण का नाम लेने के लिए उन्हें कस्टडी में ले कर काफी टॉर्चर किया गया. उन्होंने कहा कि मैं उन पुलिस वालों को नहीं छोडुंगी. मरियम और उनके साथ अन्य छह लोगों को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1998 में भारत के रॉकेट सीक्रेट पाकिस्तान को बेचने के आरोप से मुक्त करते हुए बरी कर दिया था. वहीं शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से नारायण को मुआवजा देने के आदेश पर राशिदा ने कहा कि नारायाण के करियर को जो नुकसान हुआ है और उन्होंने जो यातनाएं झेली हैं उसके लिए यह मुआवजा बेहद कम है.

सीबीआई ने दे दी थी क्लोजर रिपोर्ट
वहीं सीबीआई की ओर से केंद्र और केरल सरकार को यह सुझाव दिए गए थे कि ऐसे पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए जिन्होंने नारायण व अन्य आरोपियों को टॉर्चर किया. इस मामले में राशिदा को भी लगभग साढ़े तीन साल केरल की जेल में बताने पड़े थे. राशिदा सुप्रीम कोर्ट से बरी होने के आदेश के पहले लगभग 1994 से 1998 तक जेल में थीं. इस मामले में सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट 1998 में दाखिल कर दी थी. इसके बावजूद राशिदा को जेल में रहना पड़ा क्योंकि केरल सरकार ने राशिदा पर अन्य आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में फिर से अपील की थी. राशिदा कहती हैं कि केरल पुलिस और आईबी के लोगों ने मुझे काफी यातनाएं दीं.

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मामले की जांच कर रहे टीम के प्रमुख पर फंसाने का आरोप
ममाले की जांच कर रही टीम के प्रमुख सिबी मैथ्यूज जो बाद में केरल के डीजीपी भी हो गए थे और पुलिस की स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर एस विजयन पर राशिदा ने उन्हें फंसाने का आरोप लगाया. राशिदा ने कहा कि उनका वकील जल्द ही इस मामले में न्यायालय में अपील करेगा. हालांकि उन्होंने कहा कि वो फिलहाल भारत नहीं आने वाली हैं. उन्होंने कहा कि वो फिलहाल कानूनी सलाह ले रही हैं.

इलाज कराने भारत आईं थीं राशिदा
राशिदा बताती हैं कि वो उस दौरान स्वास्थ्य सेवाओं और अपने एक मित्र की बेटी की पढ़ाई के लिए भारत आईं थीं. उसी दौरान राशिदा ने इंस्पेक्टर विजयन से मिल कर कहा था कि मालदीव में फैले प्लेग के चलते वो फिलहाल वहां नहीं जाना चाहती हैं. ऐसे में विजयन ने उनका पासपोर्ट ले लिया और उन्हें जासूसी के आरोप में फंसा दिया. उन्होंने बताया कि उन्हें कस्टडी में काफी बुरी तरह से पीटा गया.

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