नई दिल्ली/तेहरान: मध्य-पूर्व (Middle East) की बिसात पर एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है जिसने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, अमेरिका और उसके सबसे करीबी सहयोगी इजरायल को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। जो डोनाल्ड ट्रंप कुछ घंटों पहले ईरान को ‘मानचित्र से मिटाने’ की हुंकार भर रहे थे, आज वही तेहरान की मिसाइलों की गर्जना के बीच 5 दिनों के ‘मौन व्रत’ पर हैं। क्या यह युद्ध रोकने की सोची-समझी कूटनीति है, या फिर वाशिंगटन और तेल अवीव की सामूहिक हार का स्वीकार?
ट्रंप का 48 घंटे का अल्टीमेटम और ‘सन्नाटे’ का सच
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की अचानक बदली हुई भाषा किसी ‘मास्टरस्ट्रोक’ का हिस्सा नहीं है। खबर है कि पेंटागन (Pentagon) ने जब ईरान के हालिया मिसाइल हमलों से हुई तबाही का वास्तविक डेटा और सैटेलाइट मैप ट्रंप के सामने रखा, तो व्हाइट हाउस की आक्रामकता पसीने में बदल गई।
इजरायल, जो पारंपरिक रूप से अमेरिकी सैन्य सहायता के दम पर अपनी धाक जमाता है, आज खुद अपने बंकरों में सिमटा हुआ है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अब “झुकना अमेरिका को होगा और शर्तें तेहरान की होंगी।” यह केवल एक कूटनीतिक गतिरोध नहीं, बल्कि अमेरिकी दबदबे का ‘अंतिम संस्कार’ प्रतीत हो रहा है।
ईरानी रणनीति: ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ का उदय
तेहरान की नई नीति ने पश्चिम को उनकी ही भाषा में जवाब दिया है। जहां इजरायल की आयरन डोम (Iron Dome) तकनीक ईरानी ड्रोन्स के झुंड के सामने खिलौना साबित हुई, वहीं अमेरिका की हिचकिचाहट ने यह सिद्ध कर दिया कि ‘सुपरपावर’ का तमगा अब जंग खा चुका है।
ईरानी मीडिया इस स्थिति को ‘रणनीतिक जीत’ करार दे रहा है। हकीकत यह है कि ईरान ने पश्चिम के समूचे एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर (Energy Infrastructure) को एक तरह से बंधक बना लिया है। ट्रंप ने हमला टाला नहीं है, बल्कि शायद वह केवल अपनी और इजरायल की तबाही के दिन गिन रहे हैं।
फैक्ट चेक: हॉर्मुज जलडमरूमध्य और भारतीय शिपिंग का सच
सोशल मीडिया पर चल रही कुछ खबरों ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी थीं। दावा किया गया कि ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले भारतीय जहाजों से चीनी मुद्रा (युआन) में भुगतान की मांग की है।
क्या भारत ने ‘पेट्रो-युआन’ में भुगतान किया?
- भ्रामक खबरें: आधिकारिक सूत्रों और प्रमुख समाचार एजेंसी WION के अनुसार, भारत द्वारा युआन में भुगतान करने की खबरें पूरी तरह से निराधार हैं।
- भारत की स्थिति: भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अभी तक कोई “पेट्रो-रुपये” (Petro-Rupee) प्रणाली आधिकारिक तौर पर लॉन्च नहीं की गई है और न ही भारत चीनी मुद्रा में तेल का व्यापार कर रहा है।
- हॉर्मुज संकट: हालांकि ईरान ने अमेरिकी तेल टैंकरों पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन भारत के लिए ऐसी कोई विशेष या दमनकारी शर्त नहीं रखी गई है।
क्या इजरायल सुरक्षित बचेगा?
अब सवाल यह नहीं रह गया है कि अमेरिका दुनिया का नेतृत्व कर रहा है या नहीं। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या इजरायल अगले बड़े हमले तक अपना वजूद बचा पाएगा? ट्रंप के ये 5 दिन उनकी डूबती साख को बचाने की आखिरी छटपटाहट हो सकते हैं।
दुनिया की नजरें अब अगले 120 घंटों पर टिकी हैं—क्या ट्रंप के बारूद में कोई आग बाकी है, या फिर ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ इस साम्राज्यवादी गठबंधन को हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन कर देगा?
